Sunday, 26 August 2012

हसरत मोहानी की शायरी, Shayar Hasrat Mohani

 
शायर हसरत मोहानी  
(1875-1951)

सक्षिप्त परिचय: १८७५ में उत्तरप्रदेश के उन्नाव में जन्मे मौलाना हसरत मोहानी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की जंग में शामिल रहे और कई साल जेल में भी रहे. All India Muslim League में रह कर हसरत मोहानी ने सब से पहले आज़ादी-ए-कामिल (Complete Independence) की मांग की. हसरत मोहानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI ) के संस्थापकों में से एक थे. आज़ादी के बाद उस वक़्त के कुछ बड़े शायर, मसलन जोश मलीहाबादी, नासिर काज़मी पाकिस्तान चले गए लेकिन हसरत मोहानी ने भारत में रहना पसंद किया और भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने वाली Constituent Assembly के सदस्य भी रहे. हसरत मोहानी की मृत्यु १३ मई, १९५१ को, लखनऊ में हुई. उन्हें मोहब्बत का शायर कहा जाता है, उन्होंने चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है जैसी अमर रचना लिखी है. दिल ही निकाल कर बिछा दिया, उन्होंने अपने वतन से भी बेपनाह मोहब्बत की. वे खुदा के नेक-काबिल बन्दे थे. खुदा ने उन्हें करवट दर करवट जन्नत बख्शी होगी, मुझे पूरा यकीन है.
1.
चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है
हमको अब तक आशकी का वो ज़माना याद है

बहाज़ारा इजतिराब-ओ-साद हजार इश्तियाक
तुझसे वो पहले पहल दिल का लगना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उंगली दबाना याद है

खींच लेना वो मेरा परदे का कोना दफतन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है

जान कर सोता तुझे वो कसा-ए-पाबोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है

तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अजरहे-लिहाज़
हाल-ऐ-दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो क्या तुमको भी वो कार-खाना याद है


गैर की नज़रों से बचकर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब् भी कही ज़िक्र-ऐ-फिराक
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है

दोपहर की धुप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

देखना मुझको जो बरगश्ता तोह सौ-सौ नाज़ से
जब
मना लेना तोह फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी चोरी हमसे तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दते गुज़री पर अब तक वो ठिकाना याद है

बेरुखी के साथ सुनना दर्द-ऐ-दिल की दास्ताँ
और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना याद है

वक्त-ऐ-रुखसत अलविदा का लफ्ज़ कहने के लिए
वो तेरे सूखे लबों का थर-थराना याद है

बावजूद-ए-इददा-ए-इतताका 'हसरत' मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का ये फ़साना याद है
2.
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्क-ए-उल्फत पर वो क्योंकर याद आते हैं

ना छेड़ ऐ हमनशीं कैफिअत-ए-सहबा के अफ़साने
शराब-ए-बेखुदी के मुझ को सागर याद आते हैं

रहा करते हैं कैद-ए-होश में ऐ वाये नाकामी
वो दश्त-ए-ख़ुद फरामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आती तो याद उनकी महीनों भर नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

हकीकत खुल गयी 'हसरत' तेरे तर्क-ए-मोहब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़कर याद आते हैं
3.
जो वो नज़र-बा-सरे लुत्फ़ आम हो जाये

जो वो नज़र-बा-सरे लुत्फ़ आम हो जाये
अजब नहीं कि हमारा भी काम हो जाये

रहीं-ए-यास रहे, पहले आरजू कब तक
कभी तो आपका दरबार आम हो जाये

सुना है बार सरे बख्शीश है आज पीर मुगां
हमें भी काश अता कोई जाम हो जाए

तेरे करम पे है मोकुफ कामरानी-ए-शौक
ये ना तमामे इलाही तमाम हो जाये

सितम के बाद करम है जफा के बाद अता
हमें है बस जो यही इल्तजाम हो जाये

अता हो सोज वो या रब जुनूने हसरत को
कि जिससे पुख्ता यह सौदा-ए-खाम हो जाये
4.
कैसे छुपाऊं राजे-ग़म

कैसे छुपाऊं राजे-ग़म, दीदए-तर को क्या करूं
दिल की तपिश को क्या करूं, सोज़े-जिगर को क्या करूं

शोरिशे-आशिकी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूं

ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूं बसर
सब ये कुबूल है मगर, खौफे-सेहर को क्या करूं

हां मेरा दिल था जब बतर, तब न हुई तुम्हें ख़बर
बाद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूं

5.
 अब तो उठ सकता नहीं आँखों से बारे-इन्तज़ार
अब तो उठ सकता नहीं आँखों से बारे-इन्तज़ार
किस तरह काटे कोई लैलो-निहारे-इन्तज़ार

उनकी उलफ़त का यकीं हो उनके आनें की उम्मीद
हों ये दोनों सूरतें, तब है बहारे-इन्तज़ार


मेरी आहें ना-रसा मेरी दुआएँ ना-क़बूल
या इलाही क्या करूँ मैं शर्म-सार-ए-इंतज़ार

 
उनके ख़त की आरज़ू है, उनकी आमद का ख़्याल
किस क़दर फैला हुआ है, कारोबारे-इंतज़ार

वस्ल की बनती है इन बातों से तदबीरें कहीं ?
आरज़ूओं से फिरा करतीं हैं, तक़दीरें कहीं ?

क्यो कहें हम कि ग़मेदर्द से मुश्किल है फ़राग़
जब तेरी याद में हर फ़िक्र से हासिल है फ़राग़

अब सदमये-हिजराँ से भी डरता नहीं कोई
ले पहुँची है याद उनकी बहुत दूर किसी को
मायने:
बारे-इंतिज़ार= प्रतीक्षा का बोझ, लैलो-निहारे-इंतिज़ार = प्रतीक्षा के दिन-रात,
ना-रसा=पहुँचती नहीं, ग़मेदर्द= दर्द की पीडा़, फ़राग़= छुटकारा,हिजरां= वियोग, वस्ल= मिलन,

6.
 इश्क़े-बुताँ को जी का जंजाल कर लिया है
 इश्क़े-बुताँ को जी का जंजाल कर लिया है
आख़िर में मैंने अपना क्या हाल कर लिया है

संजीदा बन के बैठो अब क्यों न तुम कि पहले
अच्छी तरह से मुझको पामाल कर लिया है

नादिम हूँ जान देकर आँखों को तूने ज़ालिम
रो-रो के बाद मेरे क्यों लाल कर लिया है
 
मायने:
 संजीदा = गम्भीर, पामाल = पद-दलित, नादिम = लज्जित
7.
  और भी हो गए बेग़ाना वो गफ़लत करके
 और भी हो गए बेग़ाना वो गफ़लत करके
आज़माया जो उन्हें तर्के-मुहब्बत करके

दिल ने छोड़ा है न छोड़े तेरे मिलने का ख़याल
बारहा देख लिया हमने मलामत करके

रुह ने पाई है तकलीफ़े-जुदाई से निजात
आपकी याद को सरमाया-ए-राहत करके

छेड़ से अब वो ये कहते हैं कि सँभलो 'हसरत'
सब्रो-ताबे-दिल-बीमार को ग़ारत करके
 
मायने:
 तर्के-मुहब्बत = प्रेम का परित्याग
बारहा = कई बार
मलामत = निन्दा
निजात = छुटकारा
सरमाया-ए-राहत = आराम की पूँजी
सब्रो-ताबे-दिल-बीमार=प्रेमी हृदय की शक्ति और शान्ति
ग़ारत = मिटा कर

8.
ख़ू समझ में नहीं आती तेरे दीवानों की
ख़ू समझ में नहीं आती तेरे दीवानों की
 जिनको दामन की ख़बर है न गिरेबानों की

आँख वाले तेरी सूरत पे मिटे जाते हैं
शम‍अ़-महफ़िल की तरफ़ भीड़ है परवानों की

राज़े-ग़म से हमें आगाह किया ख़ूब किया
कुछ निहायत ही नहीं आपके अहसानों की

आशिक़ों ही का जिगर है कि हैं ख़ुरसंदे-ज़फ़ा
काफ़िरों की है ये हिम्मत न मुसलमानों की

याद फिर ताज़ा हुई हाल से तेरे 'हसरत'
क़ैसो-फ़रहाद के भूले हुए अफ़सानों की

मायने:
 ख़ू = आदत
निहायत = हद
ख़ुरसंदे-ज़फ़ा = अकृपा पर भी प्रसन्न