Tuesday, 25 September 2012

शायर-गीतकार साहिर लुधियानवी, Sahir Ludhianvi

Sahir Ludhianvi
Born March 8, 1921, Ludhiana -Died: October 25, 1980, Mumbai
1.
ये हुस्न तेरा ये इश्क मेरा
ये हुस्न तेरा ये इश्क मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही

मुझ पर तो कई इलज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इलज़ाम सही

इस रात की निखरी रंगत को
कुछ और निखर जाने दे ज़रा

नज़रों को बहक जाने दे ज़रा
जुल्फों को बिखर जाने दे ज़रा

कुछ देर की ही तस्कीन सही
कुछ देर का ही आराम सही

जज़्बात की कलियाँ चुनना है
और प्यार का तोहफा देना है

लोगों की निगाहें कुछ भी कहें
लोगों से हमें क्या लेना है

ये ख़ास ताल्लुक आपस का
दुनिया की नज़र में आम सही

रुसवाई के डरसे घबरा कर
हम तर्क-ए-वफ़ा कब करते हैं

जिस दिल को बसा ले पहलू में
उस दिल को जुदा कब करते हैं

जो हश्र हुआ है लाखों का
अपना भी वही अंजाम सही

ये हुस्न तेरा ये इश्क मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही

मुझ पर तो कई इलज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इलज़ाम सही

2.
 तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं अभी 
तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं अभी
बेदर्द मैं ने तुझ को भुलाया नहीं अभी

कल तूने मुस्कुरा के जलाया था खुद जिसे
सीने आ-वो-चराग बुझाया नहीं अभी

गर्दन को आज भी तेरे बाहों की याद है
चौखट से तेरी सर को उठाया नहीं अभी

बेहोश होके जल्द तुझे होश आ गया
मैं बदनसीब होश में आया नहीं अभी

3.
साथी हाथ बढ़ाना
 

साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना
एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना
साथी हाथ बढ़ाना ...

हम मेहनतवालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया
सागर ने रस्ता छोड़ा परबत ने शीश झुकाया
फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाहें
हम चाहें तो पैदा करदें, चट्टानों में राहे
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना
साथी हाथ बढ़ाना ...

मेहनत अपनी लेख की रेखा मेहनत से क्या डरना
कल गैरों की खातिर की अब अपनी खातिर करना
अपना दुख भी एक है साथी अपना सुख भी एक
अपनी मंजिल सच की मंजिल अपना रस्ता नेक
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना
साथी हाथ बढ़ाना ...

एक से एक मिले तो कतरा बन जाता है दरिया
एक से एक मिले तो ज़र्रा बन जाता है सेहरा
एक से एक मिले तो राई बन सकती है परबत
एक से एक मिले तो इन्सान बस में कर ले किस्मत
साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना
साथी हाथ बढ़ाना ...

माटी से हम लाल निकालें मोती लाएं जल से
जो कुछ इस दुनिया में बना है बना हमारे बल से
कब तक मेहनत के पैरों में ये दौलत की ज़ंज़ीरें
हाथ बढ़ाकर छीन लो अपने सपनों की तस्वीरें

साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना
एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना

साथी हाथ बढ़ाना ...
 

4.
तुम्हें उदास सा पाता हूँ
तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं कई दिन से
ना जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम

वो शोखियाँ, वो तबस्सुम, वो कहकहे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम

छुपा छुपा के ख़ामोशी में अपनी बेचैनी
खुद अपने राज़ की ताशीर बन गई हो तुम

मेरी उम्मीद अगर मिट गई तो मिटने दो
उम्मीद क्या है बस एक पश-ओ-पेश है कुछ भी नहीं

मेरी हयात की गम गीनियों का गम न करो
गम हयात-ए-गम एक नक्स है कुछ भी नहीं

तुम अपने हुस्न की रानाईओं पर रहम करो
वफ़ा फरेब तुल हवस है कुछ भी नहीं

मुझे तुम्हारे तगाफ़ुल से क्यूँ शिकायत हो
मेरी फना मेरे एहसास का तकाजा है

मैं जानता हूँ के दुनिया का खौफ है तुम को
मुझे खबर है ये दुनिया अजीब दुनिया है

यहाँ हयात के परदे में मौत चलती है
शिकस्त साज़ की आवाज़ में रूह नगमा  है

मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम

ये तुम ने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूं
मगर मुझे बता दो की क्यूँ उदास हो तुम

खफा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख्ताब पर
तुम्हें खबर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम

मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूंगा
मगर खुदा के लिए तुम असीर-ए-गम न रहो

हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो

मुझे क़सम है मेरी दुःख भरी जवानी की
मैं खुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो

मैं अपनी रूह की हर एक खुशी मिटा लूंगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता

मैं खुद  को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँ
मगर ये बार-ए-मुसैब उठा नहीं सकता

तुम्हारे गम के सिवा और भी तो गम हैं मुझे
निजात जिन से मैं एक लहजा पा नहीं सकता

ये ऊंचे ऊंचे मकानों की दीवारों के तले
हर काम पे भूखे भिखारीयों की सदा

हर एक घर में अफ़लास और भूख  का शोर
हर एक सितम ये इंसानियत की आह-ओ-बुका

ये कारखानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिस में
है दफन लाखों ग़रीबों की रूह का नगमा

ये सरे राहों पे रंगीन शादीयों की झलक
ये झोंपड़ियों में ग़रीबों के बे कफ़न लाशें

ये माल रोड पे कारों की रेल पेल का शोर
ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्द रूह बेचते

गली गली में बिकते हुए जवान चेहरे
हसीं आँखों में अफसोसगर्दी सी छाई हुई

ये जंग और ये मेरे वतन के शोख जवान
खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी

ये बात बात पे कानून और जाब्ते की गिरफ्त
ये जीस्क ये गुलामी ये  दौर-ए-मजबूरी

ये गम हैं बहोत मेरी ज़िंदगी मिटाने को
उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो

5.
वो सुबह कभी तो आयेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी, वो सुबह कभी तो आयेगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगी, जब धरती नग़मे गाएगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर के जीते हैं
जिस सुबह की अमृत की धुन में, हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, एक दिन तो करम फ़रमायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

माना के अभी तेरे मेरे इन अरमानों की, कीमत कुछ नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इनसानों की कीमत कुछ भी नहीं
इनसानों की इज़्ज़त जब झूठे सिक्कों में ना तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

दौलत के लिये अब औरत की, इस्मत को ना बेचा जायेगा
चाहत को ना कुचला जायेगा, गैरत को ना बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर, ये भूख और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर, दौलत की इजारेदारी की
अब एक अनोखी दुनिया की, बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों में धूल न फेंकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों में भीख ना माँगेगा
हक माँगने वालों को, जिस दिन सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

फाकों की चिताओं पर, जिस दिन इंसान न जलाए जायेंगे
सीने के दहकते दोज़ख में, अरमां न जलाए जायेंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर के जीते हैं
जिस सुबह की अमृत की धुन में, हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, एक दिन तो करम फ़रमायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
 

6.
 सोचता हूँ कि मुहब्बत से किनारा कर तो लूँ
सोचता हूँ कि मुहब्बत से किनारा कर तो लूँ
दिल को बेगाना-ए-तरगीब-ओ-तमन्ना कर लूँ

सोचता हूँ कि मुहब्बत है जुनून-ए-रुसवा
चंद बेकार-से बेहूदा ख्यालों का हुजूम

एक आज़ाद को पाबन्द बनाने की हवस
एक बेगाने को अपनाने की सै-ए-मौहूम

सोचता हूँ कि मुहब्बत है सुरूर-ए-मस्ती
इसकी तनवीर में रौशन है फ़ज़ा-ए-हस्ती

सोचता हूँ कि मुहब्बत है बशर की फितरत
इसका मिट जाना, मिटा देना बहुत मुश्किल है

सोचता हूँ कि मुहब्बत से है ताबिंदा हयात
आप ये शमा बुझा देना बहुत मुश्किल है

सोचता हूँ कि मुहब्बत पे कड़ी शर्तें हैं
इक तमद्दुन में मसर्रत पे बड़ी शर्तें हैं

सोचता हूँ कि मुहब्बत है इक अफ़सुर्दा सी लाश
चादर-ए-इज्ज़त-ओ-नामूस में कफनाई हुई

दौर-ए-सरमाया की रौंदी हुई रुसवा हस्ती
दरगाह-ए-मज़हब-ओ-इखलाक से ठुकराई हुई

सोचता हूँ कि बशर और मुहब्बत का जुनून
ऎसी बोसीदा तमद्दुन से है इककार-ए-ज़बूँ

सोचता हूँ कि मुहब्बत न बचेगी ज़िंदा
पेश-अज़-वक़्त की सड़ जाए ये गलती हुई लाश

यही बेहतर है कि बेगाना-ए-उल्फत होकर
अपने सीने में करूं जज़्ब-ए-नफ़रत की तलाश

और सौदा-ए-मुहब्बत से किनारा कर लूँ
दिल को बेगाना-ए-तरगीब-ओ-तमन्ना कर लूँ

7.
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की

डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे की जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

[संगीन दौर=मुश्किल वक़्त]
[डस लेना=काटना; ता-उम्र=पूरी ज़िन्दगी]

गोया हम से भागती रही ये तेज़-गां उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे काटी है तमाम उम्र

[तेज़-गां=तेज कदम]

जुल्फों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फेन के ख़्वाब, कमाल-ए-सुखन के ख़्वाब

[मेराज-ए-फेन=हुनरमंदी; कमाल-ए-सुखन=एक सम्पूर्ण कविता]

तहजीब-ए-ज़िंदगी के, फ़रोग-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दां के ख़्वाब, कूचा-ए-द़ार-ओ-रसां के ख़्वाब

[तहजीब-ए-ज़िंदगी=सभ्य ज़िन्दगी; फरोग-ए-वतन=देश की उन्नति]
[ज़िन्दां=कैद; कूचा-ए-द़ार-ओ-रसां=फांसी के फंदे की ओर जाता रास्ता]

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे

ये ख़्वाब मर गए हैं तो बे-रंग है हयात
यूं है की जैसे दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात

[अमल=क्रियान्वयन; असास=नींव; हयात=ज़िन्दगी]
[दस्त-ए-तह-ए-संग=मजबूर, मदद विहीन]

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की

डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे की जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

8.
अब आयें या न आयें इधर, पूछते चलो
अब आयें या न आयें इधर, पूछते चलो
क्या चाहती है, उन की नज़र पूछते चलो

हम से अगर है तर्क-ए-ताल्लुक तो क्या हुआ
यारो कोई तो उन की ख्बबर पूछते चलो

जो खुद को कह रहे हैं की मंजिल शनास हैं
उन को भी क्या खबर है मगर पूछते चलो

किस मंजिल-ए-मुराद की जानिब रवाना हैं हम
ऐ रह-रवान ए-ख़ाक-ब-सर पूछते चलो 
 

8.
तंग आ चुके हैं
तंग आ चुके हैं कशमकश ज़िन्दगी से हम
ठुकरा न दें जहां को कहीं बेदिली से हम

लो, आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद
लो, अब कभी गिला न करेंगे, किसी से हम

उभरेंगे एक बार अभी दिल के बलबले
गो दब गए हैं बारे-गमे-ज़िन्दगी से हम

गर ज़िन्दगी में मिल गए हम इत्तिफाक से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम

अल्लाह रे! फरेबे मशीयत कि आज तक
दुनिया के जुल्म सहते रहे खामोशी से हम
मायने:
कशमकश ज़िन्दगी=जीवन का संघर्ष
बारे-गमे-ज़िन्दगी से=जीवन के दुखों के बोझ से
फरेबे मशीयत=सांसारिक छल कपट
 

9.
 हम तेरा इन्तज़ार करते हैं
चांद मद्धम है, आसमां चुप है।
नींद की गोद में जहां चुप है।

दूर वादी पे दूधिया बादल
झुक के पर्वत को प्यार करते हैं।
दिल में नाकाम हसरतें लेकर,
हम तेरा इन्तज़ार करते हैं।

इन बहारों के साये में आ जा
फिर मोहब्बत जवां रहे न रहे।
ज़िन्दगी तेरे नामुरादों पर
कल तलक मेहरबां रहे न रहे।

रोज की तरह आज भी तारे
सुबह की ग़र्द में न सो जायें।
आ तेरे ग़म में जागती आंखें
कम से कम एक रात सो जायें।

चांद मद्धम है, आसमां चुप है।
नींद की गोद में जहां चुप है।

10.
मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो
मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो।

कदम कदम पे चट्टानें खड़ी रहें, लेकिन
जो चल निकलते हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते।
हवाएँ कितना भी टकराएँ आंधियाँ बनकर,
मगर घटाओं के परछम कभी नहीं झुकते।
मेरे नदीम मेरे हमसफर .....

हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं, मगर
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है।
हज़ारों चांद सितारों का खून होता है
तब एक सुबह फिज़ाओं पे मुस्कुराती है।
मेरे नदीम मेरे हमसफर ....

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो ज़िन्दगी में नया रंग ला नहीं सकते।
जो रास्ते के अन्धेरों से हार जाते हैं
वो मंज़िलों के उजालों को पा नहीं सकते।

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो |

11.
 तुम चली जाओगी
तुम चली जाओगी, परछाईयाँ रह जायेंगी
कुछ न कुछ हुस्न की रानाइयां रह जायेंगी


तुम तो इस झील के साहिल पे मिली हो मुझ से
जब भी देखूंगा यहीं मुझ को नज़र आओगी


याद मिटती है न मंज़र कोई मिट सकता है
दूर जाकर भी तुम अपने को यहीं पाओगी


खुल के रह जायेगी झोंकों में बदन की खुश्बू
ज़ुल्फ़ का अक्स घटाओं में रहेगा सदियों


फूल चुपके से चुरा लेंगे लबों की सुर्खी
यह जवान हुस्न फ़िज़ाओं में रहेगा सदियों


इस धड़कती हुई शादाब-ओ-हसीं वादी में
यह न समझो कि ज़रा देर का किस्सा हो तुम


अब हमेशा के लिए मेरे मुकद्दर की तरह
इन नजारों के मुकद्दर का भी हिस्सा हो तुम


तुम चली जाओगी परछाईयाँ रह जायेंगी
कुछ न कुछ हुस्न की रानाईयां रह जायेंगी

12.
  जिसे तू कुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ
 जिसे तू कुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ
तेरे दिल को जो लुभाए वह सदा कहाँ से लाऊँ

मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के
मेरी उम्र बह गई है मेरे आँसुओं में ढल के
जो बहार बन के बरसे वह घटा कहाँ से लाऊँ

तुझे और की तमन्ना, मुझे तेरी आरजू है
तेरे दिल में ग़म ही ग़म है मेरे दिल में तू ही तू है
जो दिलों को चैन दे दे वह दवा कहाँ से लाऊँ

मेरी बेबसी है ज़ाहिर मेरी आहे बेअसर से
कभी मौत भी जो मांगी तो न पाई उसके दर से
जो मुराद ले के आए वह दुआ कहाँ से लाऊँ

जिसे तू कुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ 

13.
न तू ज़मीं के लिए है, न आसमाँ के लिए
 न तू ज़मीं के लिए है, न आसमाँ के लिए ।
तेरा वुजूद है अब सिर्फ़, दास्ताँ के लिए ॥

पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा,
वो शाख ही न रही, जो थी आशियाँ के लिए ।

ग़रज़-परस्त जहाँ में वफ़ा तलाश न कर
यह शैय बनी थी किसी दूसरे जहाँ के लिए ।

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