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Friday, 28 September 2012

Shayar Kaifi Azmi, शायर कैफ़ी आज़मी

Shayar Kaifi Azmi
January 14, 1919 – May 10, 2002
1. 
 वतन के लिये
यही तोहफा है यही नज़राना
मैं जो आवारा नज़र लाया हूँ
रंग में तेरे मिलाने के लिए
कतरा-ए-खून-ए-जिगर लाया हूँ
ऐ गुलाबों के वतन

पहले कब आया हूँ कुछ याद नहीं
लेकिन आया था कसम खता हूँ
फूल तो फूल हैं काँटों पर तेरे
अपने होंठों के निशान पाता हूँ
मेरे ख्वाबों के वतन

चूम लेने दे मुझे हाथ अपने
जिन से तोड़ी है कई जंजीरें
तुने बदला है मसहियत का मिजाज़
तुने लिखी हैं नयी तकदीरें
इन्क़लाबों के वतन

फूल के बाद नए फूल खिले
कभी खाली न हो दामन तेरा
रौशनी रौशनी तेरी रहे
चांदनी चांदनी आँगन तेरा
मोहब्बतों के वतन 
English
Yahii tohafaa hai yahii nazaraanaa
mai.n jo aavaaraa nazar laayaa huu.N
rang me.n tere milaane ke liye
qataraa-e-Khuun-e-jigar laayaa huu.N
ai gulaabo.n ke vatan

Pahale kab aayaa huu.N kuchh yaad nahii.n
lekin aayaa thaa qasam khaataa huu.N
phuul to phuul hai.n kaa.NTo.n pe tere
apane ho.NTo.n ke nishaa.N paataa huu.N
mere Khvaabo.n ke vatan

Chuum lene de mujhe haath apane
jin se to.Dii hai.n ka_ii zanjiire.n
tuune badalaa hai mashiyat kaa mizaaj
tuune likhii hai.n na_ii taqdiire.n
inqalaabo.n ke vatan

Phuul ke baad naye phuul khile.n
kabhii Khaalii na ho daaman teraa
roshanii roshanii terii raahe.n
chaa.Ndanii chaa.Ndanii aa.ngan teraa
maahataabo.n ke vatan
2.
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है 
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है

मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है

मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है

सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा है

तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है

सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है

जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है

हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है
 

3.
  आवारा सज़दे
इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मेरा सर्माया है
दोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़्र करूँ
कोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहीं
किस को दिल नज़्र करूँ और किसे जाँ नज़्र करूँ

तुम भी महबूब मेरे तुम भी हो दिलदार मेरे
आश्ना मुझसे मगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं
ख़त्म है तुम पे मसीहानफ़सी चारागरी
मेहरम-ए-दर्द-ए-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं

अपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहीं
दस्त-ओ-बाज़ू मेरे नाकारा हुए जाते हैं
जिनसे हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़
आज सज्दे वोही आवारा हुए जाते हैँ

दूर मन्ज़िल थी मगर ऐसी भी कुछ दूर न थी
लेके फिरती रही रस्ते ही में वहशत मुझ को
एक ज़ख़्म ऐसा न खाया के बहार आ जाती
दार तक लेके गया शौक़-ए-शहादत मुझ को

राह में टूट गये पाँव तो मालूम हुआ
जुज़ मेरे और मेरा रहनुमा कोई नहीं
एक के बाद ख़ुदा एक चला आता था
कह दिया अक़्ल ने तंग आके ख़ुदा कोई नहीं

4.
 अन्देशे
रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है
वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है
रंज तो ये है के रो-रोके भुलाया होगा

वो कहाँ और कहाँ काहिफ़-ए-ग़म सोज़िश-ए-जाँ
उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिर्माँ
उस का एह्सास-ए-लतीफ़ और शिकस्त-ए-अर्माँ
तानाज़न एक ज़माना नज़र आया होगा

झुक गई होगी जवाँ-साल उमन्गों की जबीं
मिट गई होगी ललक डूब गया होगा यक़ीं
छा गया होगा धुआँ घूम गई होगी ज़मीं
अपने पहले ही घरौंदे को जो ढाया होगा

दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाये होँगे
अश्क आँखों ने पिये और न बहाये होँगे
बन्द कमरे में जो ख़त मेरे जलाये होँगे
एक-इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा

उस ने घबराके नज़र लाख बचाई होगी
मिटके इक नक़्श ने सौ शक़्ल दिखाई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तरफ़ मुझ को तड़प्ता हुआ पाया होगा

बेमहल छेड़ पे जज़्बात उबल आये होँगे
ग़म पशेमान तबस्सुम में ढल आये होँगे
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आये होँगे
सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा

ज़ुल्फ़ ज़िद कर के किसी ने जो बनाई होगी
रूठ्व जल्वोँ पे ख़िज़ाँ और भी छाई होगी
बर्क़ अश्वोँ ने कई दिन न गिराई होगी
रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा

होके मजबूर मुझे उस ने भुलाया होगा
ज़हर चुप कर के दवा जान के ख़ाया होगा
5.
पत्थर के खुदा वहाँ भी पाए 
पत्थर के खुदा वहाँ भी पाए
हम चाँद से आज लौट आए

दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं
क्या हो गए मेहरबान साए

जंगल की हवायें आ रही हैं
कागज का यह शहर उड़ न जाए

लैला ने नया जनम लिया है
है कैस कोई तो दिल लगाए

है आज जमीं का गुस्ल-ए-सेहत
जिस दिल में हो जितना खून लाए

सहरा सहरा लहू के खेमे
फिर प्यासे लब-ए-फुरात आए

मायने: गुस्ल-ए-सेहत = स्वस्थ स्नान, सहरा = मरूस्थल
 

English 
patthar ke Khudaa vahaaN bhii paaye
ham chaaNd se aaj lauT aaye

diivaareN to har taraf khaRii haiN
kyaa ho gaye meh’rbaaN saaye

jangal kii havaayeN aa rahii haiN
kaaGhaz kaa ye shah’r uR na jaaye

Lailaa ne nayaa janam liyaa hai
hai Qais ko’ii jo dil lagaaye?

hai aaj zamiiN kaa ghus’l-e-sehat
jis dil meN ho jitnaa Khuun laaye

sehraa sehraa lahuu ke Kheme
phir pyaase lab-e-Furaat aaye*

meh’rbaan : loving, affectionate
Qais : Another name for Majnuu
ghus’l-e-sehat : Bathing after recovery from sickness
sehraa : desert
Kheme : tent
lab-e-Furaat : Bank of river Euphrates

6.
 मैं ढूंढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता
मैं ढूंढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमां नहीं मिलता

नई ज़मीं नया आसमां भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

वोह तेग मिल गई जिस से हुआ है कत्ल मिरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

वोह मेरा गांव है, वोह मेरे गांव के चूल्हे
के जिनमें शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता

जो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यों
मुझे खुद अपने कदम का निशाँ नहीं मिलता

खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता


मायने: बशर=व्यक्ति, तेग=तलवार
7.
हाथ आकर लगा गया कोई
हाथ आकर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई

लग गया इक मशीन में मैं
शहर में ले के आ गया कोई

मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई

यह सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई

ऐसी मंहगाई है के चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई

अब बोह अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई

वोह गए जब से ऐसा लगता है
छोटा मोटा खुदा गया कोई

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गांव से जब भी आ गया कोई

8.
 तुम परेशान न हो बाब-ए-करम वा न करो
तुम परेशान न हो बाब-ए-करम वा न करो
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा

इसी कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं
शब-ए-तारीक गुज़ारूँगा चला जाऊँगा

रास्ता भूल गया या यहाँ मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूँ मालूम नहीं

कहते हैं हुस्न कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूँ क्या लाया हूँ मालूम नहीं

यूँ तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहीं

कुछ तुम्हारे लिये आँखों में छुपा रक्खा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

एक तो इतनी हसीं दूसरे ये आराइश
जो नज़र पड़ती है चेहरे पे ठहर जाती है

मुस्कुरा देती हो रसमन भी अगर महफ़िल में
इक धनक टूट के सीनों में बिखर जाती है

गर्म बोसों से तराशा हुआ नाज़ुक पैकर
जिस की इक आँच से हर रूह पिघल जाती है

मैं ने सोचा है तो सब सोचते होंगे शायद
प्यास इस तरह भी क्या साँचे में ढल जाती है

क्या कमी है जो करोगी मेरा नज़राना क़ुबूल
चाहने वाले बहुत चाह के अफ़साने बहुत

एक ही रात सही गर्मी-ए-हंगामा-ए-इश्क़
एक ही रात में जल मरते हैं परवाने बहुत

फिर भी इक रात में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तनहाई का एहसास न हो

काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किस तरह गुज़ारूँगा चला जाऊँगा

तुम परेशाँ न हो बाब-ए-करम वा न करो
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा
 

9.
 बस इक झिझक है
बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में
कि तेरा ज़िक्र भी आयेगा इस फ़साने में

बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में
वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में

इसी में इश्क़ की क़िस्मत बदल भी सकती थी
जो वक़्त बीत गया मुझ को आज़माने में

ये कह के टूट पड़ा शाख़-ए-गुल से आख़िरी फूल
अब और देर है कितनी बहार आने में 

10.
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो
अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो
मुझ से बिखरे हुये गेसू नहीं देखे जाते

सुर्ख़ आँखों की क़सम काँपती पलकों की क़सम
थर-थराते हुये आँसू नहीं देखे जाते

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो
छूट जाने दो जो दामन-ए-वफ़ा छूट गया

क्यूँ ये लग़ज़ीदा ख़रामी ये पशेमाँ नज़री
तुम ने तोड़ा नहीं रिश्ता-ए-दिल टूट गया

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो
मेरी आहों से ये रुख़्सार न कुमला जायें

ढूँडती होगी तुम्हें रस में नहाई हुई रात
जाओ कलियाँ न कहीं सेज की मुर्झा जायें

अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो
मैं इस उजड़े हुये पहलू में बिठा लूँ न कहीं

लब-ए-शीरीं का नमक आरिज़-ए-नमकीं की मिठास
अपने तरसे हुये होंठों में चुरा लूँ न कहीं
 

11.
 अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहीं
अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहीं
ये कोई और जगह है ये लखनऊ तो नहीं

यहाँ तो चलती हैं छुरिया ज़ुबाँ से पहले
ये मीर अनीस की, आतिश की गुफ़्तगू तो नहीं

चमक रहा है जो दामन पे दोनों फ़िरक़ों के
बग़ौर देखो ये इसलाम का लहू तो नहीं

12.
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़म
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

साक़ी सभी को है ग़म-ए-तश्नालबी मगर
मय है उसी के नाम पे जिस के उबल पड़े


( ये नज़्म उन्होंने ११ बरस की उम्र में लिखी थी.)
13.
 हाथ आकर लगा गया कोई
हाथ आकर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई

लग गया इक मशीन में मैं
शहर में ले के आ गया कोई

मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई

यह सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई

ऐसी मंहगाई है के चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई

अब बोह अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई

वोह गए जब से ऐसा लगता है
छोटा मोटा खुदा गया कोई

मेरा बचपन भी साथ ले आया
गांव से जब भी आ गया कोई

14.
क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं
क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं
उस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गयीं

दीवाना पूछता है यह लहरों से बार बार
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गयीँ

अब जिस तरफ से चाहे गुजर जाए कारवां
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गयीं

पैमाना टूटने का कोई गम नहीं मुझे
गम है तो यह के चाँदनी रातें बिखर गयीं

पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी यह हो रहे
इक मुख्तसर सी रात में सदियाँ गुजर गयीं
 

15.
 दूसरा बनवास 
राम बनवास से जब लौटकर घर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये

धर्म क्या उनका है, क्या जात है ये जानता कौन
घर ना जलता तो उन्हे रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त, तुम्हारे खन्ज़र
तुमने बाबर की तरफ़ फ़ैंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की खता, ज़ख्म जो सर में आये

पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे

16.
 आज सोचा तो आँसू भर आए
आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए

हर कदम पर उधर मुड़ के देखा
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए

रह गई ज़िंदगी दर्द बनके
दर्द दिल में छुपाए छुपाए

17.
ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है?
 ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है?
तेरी हर लहर से बारूद की बू आती है!

खून कहाँ बहता है इन्सान का पानी की तरह
जिस से तू रोज़ यहाँ करके वजू आती है?

धाज्जियाँ तूने नकाबों की गिनी तो होंगी
यूँ ही लौट आती है या कर के रफ़ू आती है?

अपने सीने में चुरा लाई है किसे की आहें
मल के रुखसार पे किस किस का लहू आती है! 

18. 
औरत
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

19.
मेरे दिल में तू ही तू है
मेरे दिल में तू ही तू है दिल की दवा क्या करूँ
दिल भी तू है जाँ भी तू है तुझपे फ़िदा क्या करूँ

ख़ुद को खोकर तुझको पा कर क्या क्या मिला क्या कहूँ
तेरा होके जीने में क्या क्या आया मज़ा क्या कहूँ
कैसे दिन हैं कैसी रातें कैसी फ़िज़ा क्या कहूँ
मेरी होके तूने मुझको क्या क्या दिया क्या कहूँ
मेरी पहलू में जब तू है फिर मैं दुआ क्या करूँ
दिल भी तू है जाँ भी तू है तुझपे फ़िदा क्या करूँ

है ये दुनिया दिल की दुनिया, मिलके रहेंगे यहाँ
लूटेंगे हम ख़ुशियाँ हर पल, दुख न सहेंगे यहाँ
अरमानों के चंचल धारे ऐसे बहेंगे यहाँ
ये तो सपनों की जन्नत है सब ही कहेंगे यहाँ
ये दुनिया मेरे दिल में बसी है दिल से जुदा क्या करूँ
दिल भी तू है जाँ भी तू है तुझपे फ़िदा क्या करूँ

मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई ।
20.
पशेमानी

मैं यह सोचकर उसके दर से उठा था
कि वह रोक लेगी मना लेगी मुझको ।

हवाओं में लहराता आता था दामन
कि दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझको ।

क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे
कि आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको ।

कि उसने रोका न मुझको मनाया
न दामन ही पकड़ा न मुझको बिठाया ।

न आवाज़ ही दी न मुझको बुलाया
मैं आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ता ही आया ।

यहाँ तक कि उससे जुदा हो गया मैं
जुदा हो गया मैं, जुदा हो गया मैं ।

शब्दार्थ: पशेमानी=पछतावा
21.
वक्त ने किया क्या हंसी सितम
वक्त ने किया क्या हंसी सितम
तुम रहे न तुम, हम रहे न हम ।

बेक़रार दिल इस तरह मिले
जिस तरह कभी हम जुदा न थे
तुम भी खो गए, हम भी खो गए
इक राह पर चल के दो कदम ।

जायेंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है, कुछ पता नहीं
बुन रहे क्यूँ ख़्वाब दम-ब-दम ।

Kaif Bhopali, शायर कैफ भोपाली ( کیف بھوپالی)

Kaif Bhopali

1.
तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
 तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है

तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है

आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझाते बुझाते एक ज़माना लगता है

सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हंसता चेहरा एक बहाना लगता है 


Tera chehra kitna suhana lagta hai 
tere aage chand purana lagta hai

tirchhe tirchhe teer nazar ke lagte hain 
sidha sidha dil pe nishana lagta hai

aag ka kya hai pal do pal main lagti hai 
bujhte bujhte ek zamana lagta hai

sach to ye hai phool ka dil bhi chalni hai 
hansta chehra ek bahana lagta hai
2.
 कौन आयेगा यहाँ कोई न आया होगा
कौन आयेगा यहाँ कोई न आया होगा
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

दिल-ए-नादाँ न धड़क, ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क
कोई ख़त लेके पड़ोसी के घर आया होगा

गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो
आँधियों तुम ने दरख्तों को गिराया होगा 

'कैफ' परदेस में मत याद करो अपना मकान
अब के बारिश में उसे तोड़ गिराया होगा  


Kaun aayegaa yahaa’n koii na aayaa hogaa 
meraa daravaazaa havaao’n ne hilaayaa hogaa

dil-e-naadaan na dhadak, ai dil-e-naadaan na dhadak 
koii khat leke padosii ke ghar aayaa hogaa

gul se lipaTii huii titalii ko giraakar dekho 
aandhiyo’n tum ne drakhto’n ko giraayaa hogaa

'Kaif' parades me’n mat yaad karo apanaa makaan 
ab ke baarish me’n use tod giraayaa hogaa
 English Translation

Kaun aayega yahan koi na aaya hoga,
Mera darwaaza hawaon nay hilaaya hoga !

[Who will come here, nobody must have come here,
Winds may have thrown open my door !]

Dil-e-naadan na dhadk ay dil-e-naadan na dhadak,
Koi khat ley kay padosi kay ghar aaya hoga !

[My poor heart, stop beating, my poor heart, stay calm,
Somebody may have come to deliver the letter to my neighbor !]

Gul say lipti hui titli ko gira kar dekho,
Aandhiyaan tumnay darakhton ko giraaya hoga !

[Let us see how you can fly away the butterfly from a flower,
Oh ! Storms, you may have uprooted the trees !]

Kaif pardes mein mat yaad karo apna makaan,
Ab kay baarish nay usay tod giraaya hoga !

['Kaif', don't remember your home while staying overseas,
This season, rains may have demolished that house !]

Kaun aayega yahan koi na aaya hoga,
Mera darwaaza hawaon nay hilaaya hoga !

[Who will come here, nobody must have come here,
Winds may have thrown open my door !]

3. 
क्यों फिर रहे हो कैफ़ ये ख़तरे का घर लिए
क्यों फिर रहे हो कैफ़ ये ख़तरे का घर लिए
ये कांच का शरीर ये काग़ज़ का सर लिए

शोले निकल रहे हैं गुलाबों के जिस्म से
तितली न जा क़रीब ये रेशम के पर लिए

जाने बहार नाम है लेकिन ये काम है
कलियां तराश लीं तो कभी गुल क़तर लिए

रांझा बने हैं, कैस बने, कोहकन बने
हमने किसी के वास्ते सब रूप धर लिए

ना मेहरबाने शहर ने ठुकरा दिया मुझे
मैं फिर रहा हूं अपना मकां दर-ब-दर लिए 
4.
 दरो-दीवार पे शक्लें-सी बनने आई
दरो-दीवार पे शक्लें-सी बनने आई
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई

जिंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है
रहम-दिल माँ की तरह मौत बचाने आई

आजकल फिर दिले-बेताब की बातें हैं
वही हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई

दिल में आहट-सी हुई, रूह में दस्तक गूंजी
किसकी खुशबू मुझे ये मेरे सिरहाने आई

मैंने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था
दूर तक मुझको इक आवाज़ बुलाने आई

तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिम निकली
जब भी आई है, मेरा दिल ही दुखाने आई 


Daro-deewar pe shakleN-si banane aaii
Phir ye barish meri tanhaaii churane aaii.

Zindgi baap ki manind sazaa deti hai
Raham-dil maaN kii tarah maut bachane aaii.

Aajkal phir dile-betaab kii bateN haiN wahi
Hum to samjhe the ke kuchh akl thikane aaii.

Dil meiN aahat-si hui, rooh mein dastak guNjii
Kiski khushboo mujhe ye mere sirhane aaii.

Maine jab pehle-pehal apna watan chhoda tha
Door tak mujhko ik aawaaz bulane aaii.

Teri manind teri yaad bhi zalim nikli
Jab bhi aaii hai, mera dil hi dukhane aaii.
5.
झूम के जब रिन्दों ने पिला दी
झूम के जब रिन्दों ने पिला दी
शेख ने चुपकेचुपके दुआ दी

एक कमी थी ताज महल में
हमने तेरी तस्वीर लगा दी

आप ने झूठा वादा कर के
आज हमारी उम्र बड़ा दी

तेरी गली में सजदे कर के
हमने इबादतगाह बना दी 


Jhuum ke jab rindo’n ne pilaa dii 
shekh ne chupke chupke duaa dii

ek kamii thii taaj mahal me’n 
hamane terii tasviir lagaa dii

aap ne jhoothaa vaadaa kar ke 
aaj hamaarii umr badhaa dii

terii galii me’n sajde kar ke 
hamane ibaadatgaah banaa dii
6.
दाग दुनिया ने दिए ज़ख्म ज़माने से मिले
दाग दुनिया ने दिए ज़ख्म ज़माने से मिले
हम को ये तोहफे तुम्हें दोस्त बनाने से मिले

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
वो फलाने से फलाने से फलाने से मिले 

खुद से मिल जाते तो चाहत का भरम रह जाता
क्या मिले आप जो लोगों के मिलाने से मिले

कैसे माने के उन्हें भूल गया तू ऐ 'कैफ'
उन के ख़त आज हमें तेरे सरहाने से मिले  


Daagh duniyaa ne diye zakhm zamaane se mile
ham ko ye tohafe tumhen dost banaane se mile

ham tarasate hii taraste hii tarasate hii rahe 
vo falaane se falaane se falaane se mile

Khud se mil jaate to chaahat kaa bharam rah jaataa 
kyaa mile aap jo logo’n ke milaane se mile

kaise maane ke unhe’n bhuul gayaa tuu ai 'Kaif' 
un ke khat aaj hame’n tere sarahaane se mile
7.
हाय लोगों की करम-फर्माइयां
हाय लोगों की करम-फर्माइयां
तोहमतें, बदनामियाँ, रुसवाइयां

(करम-फर्माइयां:तरफदारी, पक्ष लेना)

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है
दूरियाँ, मजबूरियां, तन्हाइयां

क्या ज़माने में यूं ही कटती है रात
करवटें, बेताबियाँ, अंगडाइयां

क्या यही होती है शाम-ए-इन्तिज़ार
आहटें, घबराहटे, परछाइयां

एक पैकर में सिमट कर रह गयीं
खूबियाँ, ज़ेबाइयां, रानाइयां

(पैकर:आभास,उपस्थिति; ज़ेबाइयां:शालीनता; रानाइयां:सौन्दर्य)

ज़ख्म दिल के फिर हरे करने लगीं
बदलियाँ, बरखा रुतें, पुरवाइयां

“कैफ” पैदा कर समंदर की तरह
वुसतें, खामोशियाँ, गहराइयां

(वुसतें:फैलाव, विस्तार)
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Movie: Pakeeza
Singer(s): Latamangeshkar and Koras
Music Director: Ghulam Mohammad
Lyricist: Kaif Bhopali
Actors/Actresses:Ashok Kumar, Rajkumar, Meena Kumari
Year: 1971

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे
(तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे) - 2

आप तो आँख मिलाते हुए शरमाते हैं,
आप तो दिल के धड़कने से भी डर जाते हैं फिर भी ये जिद है के हम ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे,
(तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे) - 2

प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
सुनते आए हैं के ये ख्वाब बुरा होता है
आज इस ख्वाब की ताबीर मगर देखेंगे
(तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे) - 2

जानलेवा है मुहब्बत का समा आज की रात
शम्मा हो जाएगी जल जल के धुआँ आज की रात
आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे (2)
(तीर-ए-नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे) - 2
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Wednesday, 26 September 2012

शायर गीतकार जावेद अख्तर, Shayar-Poet-lyricist Javed Akhtar

Shayar-Poet-lyricist Javed Akhtar
Born : January 17, 1945 
 1.
 ये तेरा घर ये मेरा घर
ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर
तो पहले आके माँग ले, मेरी नज़र तेरी नज़र
ये घर बहुत हसीन है

न बादलों की छाँव में, न चाँदनी के गाँव में
न फूल जैसे रास्ते, बने हैं इसके वास्ते

मगर ये घर अजीब है, ज़मीन के क़रीब है
ये ईँट पत्थरों का घर, हमारी हसरतों का घर

जो चाँदनी नहीं तो क्या, ये रोशनी है प्यार की
दिलों के फूल खिल गये, तो फ़िक्र क्या बहार की

हमारे घर ना आयेगी, कभी ख़ुशी उधार की
हमारी राहतों का घर, हमारी चाहतों का घर

यहाँ महक वफ़ाओं की है, क़हक़हों के रंग है
ये घर तुम्हारा ख़्वाब है, ये घर मेरी उमंग है

न आरज़ू पे क़ैद है, न हौसले पर जंग है
हमारे हौसले का घर, हमारी हिम्मतों का घर
2.
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालात की आंधी में बिखर जाओगी

रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ
ये तो बस मैं हूँ के इस हाल में भी ज़िन्दा हूँ
ख़्वाब क्यूँ देखूँ वो कल जिसपे मैं शर्मिन्दा हूँ
मैं जो शर्मिन्दा हुआ तुम भी तो शरमाओगी

क्यूं मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुमको तो आसान रहे
हमसफ़र मुझको बनाओगी तो पछताओगी

एक मैं क्या अभी आयेंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी
3.
 प्‍यास की कैसे लाए ताब कोई
प्‍यास की कैसे लाए ताब कोई
नहीं दरिया तो हो सराब कोई

रात बजती थी दूर शहनाई
रोया पीकर बहुत शराब कोई

कौन सा ज़ख्‍म किसने बख्‍शा है
उसका रखे कहाँ हिसाब कोई

फिर मैं सुनने लगा हूँ इस दिल की
आने वाला है फिर अज़ाब कोई
4.
मैनें दिल से कहा
मैनें दिल से कहा
ऐ दीवाने बता
जब से कोई मिला
तू है खोया हुआ
ये कहानी है क्या
है ये क्या सिलसिला
ऐ दीवाने बता

मैनें दिल से कहा
ऐ दीवाने बता
धड़कनों में छुपी
कैसी आवाज़ है
कैसा ये गीत है
कैसा ये साज़ है
कैसी ये बात है
कैसा ये राज़ है
ऐ दीवाने बता

मेरे दिल ने कहा
जब से कोई मिला
चाँद तारे फ़िज़ा
फूल भौंरे हवा
ये हसीं वादियाँ
नीला ये आसमाँ
सब है जैसे नया
मेरे दिल ने कहा
5.
ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
 ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
प्यार की राह के हमसफ़र
किस तरह बन गये अजनबी
ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
फूल क्यूँ सारे मुरझा गये
किस लिये बुझ गई चाँदनी
ये बता दे मुझे ज़िन्दगी

कल जो बाहों में थी
और निगाहों में थी
अब वो गर्मी कहाँ खो गई
न वो अंदाज़ है
न वो आवाज़ है
अब वो नर्मी कहाँ खो गई
ये बता दे मुझे ज़िन्दगी

बेवफ़ा तुम नहीं
बेवफ़ा हम नहीं
फिर वो जज़्बात क्यों सो गये
प्यार तुम को भी है
प्यार हम को भी है
फ़ासले फिर ये क्या हो गये
ये बता दे मुझे ज़िन्दगी
6.
उलझन
करोडो चेहरे
और
उनके पीछे
करोडो चेहरे
ये रास्ते है की भीड़ है छते
जमीं जिस्मो से ढक गई है
कदम तो क्या तिल भी धरने की अब जगह नहीं है
ये देखता हूँ तो सोचता हूँ
की अब जहाँ हूँ
वहीँ सिमट के खड़ा रहूँ मै
मगर करूँ क्या
की जानता हूँ
की रुक गया तो
जो भीड़ पीछे से आ रही है
वो मुझको पेरों तले कुचल देगी, पीस देगी
तो अब चलता हूँ मै
तो खुद मेरे पेरों मे आ रहा है
किसी का सीना
किसी का बाजू
किसी का चेहरा
चलूँ
तो ओरों पे जुल्म ढाऊ
रुकूँ
तो ओरों के जुल्म झेलूं
जमीर
तुझको तो नाज है अपनी मुंसिफी पर
जरा सुनु तो
की आज क्या तेरा फैसला है
7.
कभी यूं भी तो हो
कभी यूं भी तो हो
कभी यूं भी तो हो
दरिया का साहिल हो पूरे चाँद की रात हो और तुम आओ
कभी यूं भी तो हो
कभी यूं भी तो हो
परियों की महफिल हो कोई तुम्हारी बात हो और तुम आओ
कभी यूं भी तो हो
कभी यूं भी तो हों
कभी यूं भी तो हो
ये नरम मुलायम ठंडी हवाएं जब घर से तुम्हारे गुजरे, तुम्हारी खुश्बू चुराएं,
मेरे घर ले आयें,
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो,
सूनी हर महफिल हो कोई न मेरे साथ हो,
और तुम आओ,
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
ये बादल टूट कर ऐसा बरसे
मेरे दिल की तरह तुम्हारा दिल भी मिलने को तरसे,
तुम निकलो घर से,
कभी यूं भी तो हो
कभी यूं भी तो हो,
तन्हाई हो दिल हो, बूंदें हों बरसात हों और तुम आओ,
कभी यूं भी तो हो
कभी यूं भी तो हो,
दरिया का साहिल हो पूरे चाँद की रात हो और तुम आओ
कभी यूं भी तो हो
कभी यूं भी तो हो
English
Kabhi Yoon Bhi To Ho
kabhi yun bhi to ho -2
dariyaa kaa saahil ho, poore chaand ki raat ho
aur tum aao
kabhi yun bhi to ho -2
pariyon ki mahfil ho, koi tumhaari baat ho
aur tum aao
kabhi yuN bhi to ho -2

kabhi yuN bhi to ho
ye naram mulaayam thandi havaayen
jab ghar se tumhaare guzaren, tumhaari khushboo churaayen
mere ghar le aayen
kabhi yun bhi to ho -2

sooni har mahfil ho, koi naa mere saath ho
aur tum aao
kabhi yun bhi to ho -2

kabhi yun bhi to ho
ye baadal aisaa toot ke barse
mere dil ki tarah milne ko, tumhaara dil bhi tarse
tum niklo ghar se
kabhi yun bhi to ho -2
tanhaai ho dil ho, boonde hon barsaat ho aur tum aao
kabhi yun bhi to ho -2
dariyaa kaa saahil ho, poore chaand ki raat ho
aur tum aao
kabhi yun bhi to ho -4 
8. 
दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं
दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं
ज़ख्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं

उस दरीचे में भी अब कोई नहीं और हम भी
सर झुकाए हुए चुप-चाप गुज़र जाते हैं

रास्ता रोके खडी है यही उलझन कब से
कोई पूछे तो कहें क्या की किधर जाते हैं

नर्म आवाज़ भली बातें मोहज्ज़ाब लहजे
पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं
9.
दर्द अपनाता है पराये कौन
दर्द अपनाता है पराये कौन
कौन सुनता है और सुनाये कौन

कौन दोहराए वो पुरानी बात
गम अभी सोया है जगाये कौन

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं
कौन दुःख झेले आज़माए कौन

अब सुकून है तो भूलने में है
लेकिन उस शख्स को भुलाए कौन

आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आये कौन 
10.
मैं और मेरी आवारगी
फिरते हैं कब से दर-ब-दर अब इस नगर अब उस नगर
एक दूसरे के हमसफ़र मैं और मेरी आवारगी
ना आशना हर रहगुज़र ना मेहरबान है एक नज़र
जाएँ तो अब जाएँ किधर मैं और मेरी आवारगी

हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बर्बाद थे
बिफिक्र थे आज़ाद थे मसरूर थे दिलशाद थे
वो चाल ऐसी चल गया हम बुझ गए दिल जल गया
निकले जला के अपना घर मैं और मेरी आवारगी

वो माह-ए-वश वो माह-ए-रूह वो माह-ए-कामिल हू-ब-हू
थीं जिस की बातें कू-ब कू उस से अजब थी गुफ्तगू
फिर यूं हुआ वो खो गई और मुझ को जिद सी हो गई
लायेंगे उस को ढूँढ़  कर मैं और मेरी आवारगी

ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऎसी कह गया
कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया
जब कह कर वो दिलबर गया तेरे लिए मैं मर गया
रोते हैं उस को रात भर मैं और मेरी आवारगी

अब गम उठायें किस लिए ये दिल जलाएं किस लिए
आंसू बहायें किस लिए यूं जान गवाएं किस लिए
पेशा न हो जिस का सितम, ढूँढेंगे अब ऐसा सनम
होंगे कहीं तो कारगर मैं और मेरी आवारगी

आसार हैं सब खोट के इमकान हैं सब चोट के
घर बंद हैं सब कोट के अब ख़त्म है सब टोटके
किस्मत का सब ये खेल है अंधेर ही अंधेर है
ऐसे हुए हैं बेअसर मैं और मेरी आवारगी

जब हम-दम-ओ-हमराज़ था तब और ही अंदाज़ था
अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था
अब मुझ से हो तो हो भी क्या है साथ वो तो वो भी क्या
एक बेहुनर एक बेसबर मैं और मेरी आवारगी 
11.
मुझको यकीन है सच कहती थीं
मुझको यकीन है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियां रहती थीं

इक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे रिश्ता तोड़ लिया
इक वो दिन दिन जब पेड़ की शाखें बोझ हमारा सहती थीं

इक ये दिन जब लाखों गम और काल पडा है आंसू का
इक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं

इक ये दिन जब सारी सड़कें रुठी रुठी लगती हैं
इक वो दिन जब 'आओ खेलें' सारी गलियाँ कहती थीं

इक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं
इक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं

इक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं
इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं

इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामान रहता है
इक वो घर जिसमें मेरी बूढी नानी रहती थीं 
12.
आज मैंने अपना फिर सौदा किया
आज मैंने अपना फिर सौदा किया
और फिर मैं दूर से देखा किया

जिन्‍दगी भर मेरे काम आए असूल
एक एक करके मैं उन्‍हें बेचा किया

कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी
तुम से क्‍या कहते कि तुमने क्‍या किया

हो गई थी दिल को कुछ उम्‍मीद सी
खैर तुमने जो किया अच्‍छा किया
 English
Aaj Maine Apna phir Sauda kiya
Aur phir main Door se Dekha kiya

Zindagi bhar mere Kaam aaye Usool
Ek Ek karke unhe Becha kiya

Kuch Kami apni Wafaon mein bhi thi
Tumse kya Kehte ke Tumne kya kiya

Ho gayi thi Dil ko kuch Umeed si
Khair Tumne jo kiya Acha kiya
13.
जाने के लिए मत आना
अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ अहसान जताने के लिए मत आना

मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं
दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं

ये हँसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना
प्‍यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं

चाहने वालों की तक़बीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना

अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई

तुम कांई रस्‍म निभाने के लिए मत आना
अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ अहसान जताने के लिए मत आना


 English
Ab Agar Aao To Jaane Ke Liye Mat Aana,
Sirf Ehsaan Jatane Ke Liye Mat Aana,

Maine Palko Pe Tamannaye Saja Rakhe Hai,
Dil Main Umeed Ki Sau Shamme Jala Rakhi Hai,

Yeh Shamme Bujhane Ke Liye Mat Aana,
Pyar Ki Aag Me zanjeere Phighal Jati Hain,

Chahne Walo Ki Takdire Badal Jati Hain,
Tum Ho Bebas, Ye Batane Ke Liye Mat Aana,

Ab Tum Aana, Agar Tumhe Mujhse Mohabat Hai,
Mujhse Milne Ki Agar Tumko Bhi Chahat Hai,

Tum Koi Rasam Nibhane Ke Liye Mat Aana,
Ab Agar Aao To Janay Ke Liye Mat Aana,
Sirf Ehsaan Jatane Ke Liye Mat Aana

14.
आसार-ए-कदीमा

एक पत्थर की अधूरी मूरत
चंद तांबें के पुराने सिक्के
काली चांदी के अजब जेवर
और कई कांसे के टूटे बर्तन

एक सहरा में मिले
जेरें-जमी
लोग कहते है की सदियों पहले
आज सहारा है जहां

वहीँ एक शहर हुआ करता था
और मुझको ये ख्याल आता है

किसी तकरीब
किसी महफ़िल में
सामना तुझसे मेरा आज भी हो जाता है
एक लम्हे को

बस एक पल के लिए
जिस्म की आंच
उचटती-सी नजर
सुर्ख बिंदिया की दमक

सरसराहट तेरी मलबूस  की
बालों की महक
बेख़याली में कभी
लम्स  का नन्हा फूल

और फिर दूर तक वही सहरा
वही सहरा की जहां
कभी एक शहर हुआ करता था
15.
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे 
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे
यही हालात इब्तदा से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे

बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे

इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे

बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे

उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे

16.
सच ये है बेकार हमें गम होता है
सच ये है बेकार हमें गम होता है
जो चाहा था दुनिया में कम होता है

ढलता सूरज फैला जंगल रास्ता गुम
हमसे पूछो कैसा आलम होता है

गैरों को कब फुरसत है दुःख देने की
जब होता है कोई हम-दम होता है

ज़ख्म तो हम ने इन आँखों से देखे हैं
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है

ज़हन की शाखों पर अशार आ जाते हैं
जब तेरी यादों का मौसम होता है 

17.
आप भी आइए, हम को भी बुलाते रहिए
आप भी आइए, हम को भी बुलाते रहिए
दोस्‍ती ज़ुर्म नहीं, दोस्‍त बनाते रहिए।

ज़हर पी जाइए और बाँटिए अमृत सबको
ज़ख्‍म भी खाइए और गीत भी गाते रहिए।

वक्‍त ने लूट लीं लोगों की तमन्‍नाएँ भी,
ख्‍वाब जो देखिए औरों को दिखाते रहिए।

शक्‍ल तो आपके भी ज़हन में होगी कोई,
कभी बन जाएगी तसवीर, बनाते रहिए।

 English
Aap bhi aaiye, hum ko bhi bulate rahiye,
dosti jurm nahi dost banate rahiye.

Zeher pee jaiye, aur bantiye amrit sabko,
zakhm bhi khaiye aur geet bhi gate rahiye.

waqt ne loot lee logon ki tamanaein bhi,
khwab jo dekhiye auron ko dikhate rahiye.

shakal to aap ke bhi zehen mein hogi koi,
kabhi ban jayegi tasveer, banate rahiye.

18.
 मैं भूल जाऊं अब यही मुनासिब है
मैं भूल जाऊं अब यही मुनासिब है  
मगर भूलना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कमबख्त
भुला सका न ये सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त
वो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हें भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
की तुम तो फिर भी हकीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं   

19.
हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है
हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है
हँसती आँखों में भी नमी-सी है

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है

किसको समझायें किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है

कह गए हम ये किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी-सी है

हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी-सी है

20.
तुमको देखा तो ये ख़याल आया
तुमको देखा तो ये ख़याल आया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की
आज फिर दिल को हमने समझाया

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया

21.
 मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाये हमने पाने में

वो शक्ल पिघली तो हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

जो मुंतज़िर न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलट के आने में

लतीफ़ था वो तख़य्युल से, ख़्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में

समझ लिया था कभी एक सराब को दरिया
पर एक सुकून था हमको फ़रेब खाने में

झुका दरख़्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज़ियादा फ़र्क़ नहीं झुक के टूट जाने में

22.
 मुअम्मा ( पहेली )
हम दोनों जो  हर्फ़  थे
हम इक  रोज़ मिले
इक लफ्ज़ बना
और हमने इक माने पाए
फिर जाने क्या हम पर गुजरी
और अब यूँ है
तुम इक हर्फ़ हो
इक खाने में
मैं इक हर्फ़ हूँ
इक खाने में
बीच में
कितने लम्हों के खाने खाली हैं
फिर से कोई लफ्ज़ बने
और हम दोनों इक माने पायें
ऐसा हो सकता है
लेकिन सोचना होगा
इन खाली खानों में हमें भरना क्या है