Friday, 5 April 2013

धरती और औरत

धरती
सब कुछ सहन कर लेती है
चाहे हो
बादलों का कहर बरपाना,
बरसना, बेरहमी से

या हो
बादलों का तरसा जाना,
नहीं बरसना, बेरहमी से

वह सह लेती है
बहुत सी बार
अनगिनत बरसातें

सह लेती है
सूखती नदियों,
तालाबों के दर्द

सब कुछ
सह लेती है वह
और रखती है
अपने भीतर
खारे समन्दरों,
तपते रेगिस्तानों की
अनकही वेदना

सब सहते-सहते
जब सहना
बर्दाश्त से बाहर
हो जाता है तो
फट पड़ती है, वह
धरती के भीतर से बाहर
आते है, कई
धधकते ज्वालामुखी,
विनाशकारी जलजले और सुनामी
मच जाता है
सब और हाहाकार
रो लेती है
वह खुद को कष्ट दे कर
फिर शांत भी हो जाती है

क्या तुम जानते हो?
धरती की फितरत
औरत से इतनी
मिलती-जुलती
क्यों होती है?
-आराधना सिंह

फिर गुजरे उन्हीं रास्तों से

आज
फिर गुजरे
उन्हीं रास्तों से
जिन रास्तों पर
हम कभी बिछड़े थे

एक तुझसे
बिछड़ने के बाद
कल तक के
जाने-पहचाने
रास्तों ने, इंसानों ने,
सब ने
इस तरह
अजनबी निगाहों से,
देखा मुझे ..
जैसे मेरा,
इन रास्तों से
कभी कोई वास्ता ही
न रहा हो

कभी-कभी
एक शख्स के
बिछड़ने से,
ज़िन्दगी में,
कितना कुछ
बदल जाता है,
पूरी ज़िन्दगी ही
बदल जाती है
-आराधना सिंह

वादा तो नहीं था

ऐसा कोई
वादा तो नहीं था
हमारे दरम्यां

फिर भी एक
उम्र गुज़ार दी
तेरे साथ यूँ ही
ख्वाबों-ख्यालों की
महफ़िलें सज़ा कर

किनारा करते रहे
हकीकत की
दुनिया से

मुलाकातें होती रही
तुझसे
तेरी यादों के साथ

अब तो आदत सी
हो गई है
हमेशा यूँ ही तेरे
साथ रहने ही

बिछड़ कर
बहुत दूर
आ गए है हम
फिर भी
मेरे दिल को
आज भी तुमसे
इतनी उम्मीदें
क्यूँ है?
-आराधना सिंह

Wednesday, 3 April 2013

जब भी शिकस्त खाई

दिल ने
जब भी
शिकस्त खाई
मुझे तुम्हारी वफायें
बहुत याद आई

और याद आया
तुम्हारा
मेरे करीब से
गुज़र जाना,
चार कदम
आगे जा कर
ठहर जाना,
मुड़ कर तसल्ली करना
कि क्या मेरी निगाहें
तुम्हारा पीछा कर रही है ?

फिर
एक दिन
बातों-बातों में
तुम्हारा
मुझसे पूछ ये लेना कि
मोहब्बतों के खेल में
क्या होता है?

और याद आता है
इस पर
मेरा जवाब देना कि
ये खतरनाक खेल होता है,
जिंदगी में हमेशा
जीतने वाले भी
अक्सर
इसमें मात खा जाते है

सच, जब भी ये दिल
शिकस्त खाता है
दोस्त ! तुम
याद बेहिसाब आते हो
-आराधना सिंह

बहुत मुश्किल होता है

बहुत मुश्किल होता है
जीती हुई बाज़ी
हारने के बाद
एक हारी हुई
ज़िन्दगी को
जीते रहना

बहुत मुश्किल होता है
बिना साथी के
कंटीली राहों से
अकेले
दामन बचा कर
गुजरना

आसान तो होता है
ये कह देना कि
खुद को संभाल लेंगे,
यादो के सहारे
जी लेंगे,पर

बहुत मुश्किल होता है
इतिहास बनी यादों
के साथ तन्हा जीवन
बसर करना
-आराधना सिंह

Sunday, 31 March 2013

आँखों के समंदर में

तुम्हारी
आँखों के
समंदर में,
सनम !
जिस पल उतरे थे

तब से आज तक
हमें वहाँ
क्या-कुछ
नहीं मिला

कई अनमोल
छिपे खजाने मिले

इस दुनिया से
जुदा
एक नई
दुनिया मिली

और
वो सब मिला
जो रंगीन ख्वाबो में देखा था,
मुहब्बत की किताबों में पढ़ा था,
खुशनुमा तन्हाइयों में सोचा था

और मैंने
वो सब भी पाया
जो कभी दुआओं में माँगा था
-आराधना सिंह

Saturday, 30 March 2013

ग़मगीन पलों में

बिछड़ते हुए
ग़मगीन पलों में
उसने अपनी
उदास आँखों से
विदा लेते हुए
ये कहा था कि

कभी, जब
तुम्हें मेरी
बहुत याद आए
और
दिल बोझिल सा
हो जाए
तो थोड़ा
रो भी लेना
कुछ छिपा-जमा दर्द
आँसुओं के साथ
बह जाएगा,
जी हल्का हो जाएगा,
तुम्हें थोड़ा
सुकून मिल जाएगा

उसे इस तरह
देख कर ......
मुझसे
न पूछा जा सका
कि जब तुमको
मेरी याद आएगी
तब तुम क्या करोगे?
-आराधना सिंह