Thursday, 20 September 2012

शायर मोहसिन नकवी, Shayar Mohsin Naqvi

 
शायर मोहसिन नकवी 
(1955 to 15 January 1996)

मोहसिन नकवी का असली नाम गुलाम अब्बास नकवी था. उनका जनम 1955  में पाकिस्तान में डेरा गाजी खान में हुआ था.उन्होंने प्यार-मुहब्बत व दर्शन पर बड़ी शानदार गज़ले लिखी है. आप उर्दू के नामचिनी शायर है. आपका 42 बरस की उम्र में ही कत्ल कर दिया गया. लेकिन आप अपनी शायरी के मार्फ़त हमेशा अमर है. खुदा आपको करवट करवट जन्नत नसीब करें.
1.
किसी को आवाज़ नहीं देनी मोहसिन
 ये सोच लिया है के किसी को आवाज़ नहीं देनी मोहसिन !
के अब मैं भी तो देखूं कोई कितना तलबगार है मेरा
2.
मगर ज़र्फ़ आसमान का है
 मैं खुद ज़मीन हूँ मगर ज़र्फ़ आसमान का है
के टूट कर भी मेरा हौसला चट्टान का है
बुरा न मान मेरे हर्फ ज़हर-ज़हर से हैं
मैं क्या करूँ के येही जायका जुबान का है 
3.
हम आईना साफ़ करते रहे 
 बस एक ही गलती हम सारी ज़िन्दगी करते रहे मोहसिन
धुल चेहरे पर थी और हम आईना साफ़ करते रहे 
4.
दिलों की बस्ती को लोग
 दिलों की बस्ती को लोग मोहसिन
उजाड़ उजाड़ के ये कह गए हैं .!
जहाँ वफाओं में खोट देखो
वहां कभी भी खड़े न रहना ..!
5.
बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती
 उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती
बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है

मुहब्बत एक फितरत है, हाँ फितरत कब बदलती है
सो, जब हम दूर हो जाएं, नए रिश्तों में खो जाएं

तो यह मत सोच लेना तुम, के मुहब्बत मर गई होगी
नहीं ऐसे नहीं होगा ..

मेरे बारे में गर तुम्हारी आंखें भर आयें
छलक कर एक भी आंसू पलक पे जो उतर आये

तो बस इतना समझ लेना,
जो मेरे नाम से इतनी तेरे दिल को अकीदत है

तेरे दिल में बिछड़ कर भी अभी मेरी मुहब्बत है
मुहब्बत तो बिछड़ कर भी सदा आबाद रहती है

मुहब्बत हो किसी से तो हमेशा याद रहती है
मुहब्बत वक़्त के बे-रहम तूफ़ान से नहीं डरती

उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती ?.!!

6.
  जब भी मुझे दिल से पुकारा
 उसने जब जब भी मुझे दिल से पुकारा मोहसिन
मैंने तब तब यह बताया के तुम्हारा मोहसिन

लोग सदियों की खताओं पे भी खुश बसते हैं
हमको लम्हों की वफाओं ने उजाड़ा मोहसिन

जब आगया हो ये यकीन अब वोह नहीं आयेगा
गम और आंसू ने दिया दिल को सहारा मोहसिन

वोह था जब पास तो जीने को भी दिल करता था
अब तो पल भर भी नहीं होता गुज़ारा मोहसिन

उसको पाना तो मुक़द्दर की लकीरों में नहीं
उसका खोना भी करें कैसा गवारा मोहसिन

7.
 वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है 
 वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है
वोह सच कहे न कहे ऐतबार करना है

यह तुझ को जागते रहने का शौक कब से हुआ?
मुझे तो खैर तेरा इंतजार करना है

हवा की ज़द में जलाने हैं आंसूं के चिराग
कभी ये जशन सर ए-राह-गुज़र करना है

वोह मुस्कुरा के नए वास-वासों में ढल गया
ख़याल था के उसे शरमसार करना है

मिसाल-ए-शाख-ए बढ़ाना खिजान की रुत में कभी
खुद अपने जिसम को बे बर्ग ओ बार करना है

तेरे फ़िराक में दिन किस तरह कटें अपने
कि शुगल-ए-शब् तो सितारे शुमार करना है

चलो ये अश्क ही मोती समझ के बेच आये
किसी तरह तो हमें रोज़गार करना है

कभी तो दिल में छुपे ज़ख़्म भी नुमायाँ हों
काबा समझ के बदन तार तार करना है

खुदा जाने ये कोई जिद, के शौक है मोहसिन
खुद अपनी जान के दुश्मन से प्यार करना है 

8.
 उसको फुर्सत ही नहीं
 उसको फुर्सत ही नहीं
वक़्त निकाले मोहसिन
ऐसे होते हैं भला
चाहने वाले मोहसिन

याद की दश्त में फिरता हूँ
मैं नंगे पांव
देख तो आ के कभी
पांव के छाले मोहसिन

खो गई सुबह की उम्मीद
और अब लगता है
हम नहीं होंगे
की जब होंगे उजाले मोहसिन

वो जो इक शख्स
मता-ए-दिल-ओ-जान था
न रहा
अब भला कौन मेरे
दर्द संभाले मोहसिन 

9.
एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी
 एक पगली मेरा नाम जो ले शरमाये भी घबराये भी
गलियों गलियों मुझसे मिलने आये भी घबराये भी

रात गए घर जाने वाली गुमसुम लड़की राहों में
अपनी उलझी जुल्फों को सुलझाए भी घबराये भी

कौन बिछड़ कर फिर लौटेगा क्यों आवारा फिरते हो
रातों को एक चाँद मुझे समझाये भी घबराये भी

आने वाली रुत का कितना खौफ है उसकी आँखों में
जाने वाला दूर से हाथ हिलाए भी घबराये भी 
10.
जब से उस ने शहर को छोड़ा
 जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रास्ता सुनसान हुआ
अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुकसान हुआ

मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तनहा मौसम में
पत्थर भी रो पड़ते हैं इन्सान तो फिर इन्सान हुआ

उस के ज़ख्म छुपा कर रखिये खुद उस शख्स की नज़रों से
उस से कैसा शिकवा कीजिये वो तो अभी नादाँ हुआ

यूँ भी कम आमेज़ था “मोहसिन” वो इस शहर के लोगों में
लेकिन मेरे सामने आकार और ही कुछ अंजाम हुआ
11.

अब तेरी याद से वेहशत नहीं होती मुझको
 अब तेरी याद से वेहशत नहीं होती मुझको
ज़ख्म खुलते हैं, अजीयत नहीं होती मुझको

अब कोई आये, चला जाए, मैं खुश रहता हूँ
अब किसी शक्स की आदत नहीं होती मुझको

ऐसा बदला हूँ, तेरे शहर का पानी पी कर
झूठ बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझको

है अमानत में खयानत, सो किसी की खातिर
कोई मरता है तो हैरत नहीं होती मुझको

इतना मसरूफ हूँ जीने की हवस में 'मोहसिन'
सांस लेने की भी फुरसत नहीं होती मुझको

12.
 रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो
 रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाया न करो
आँख सच बोलती हैं प्यार छुपाया न करो

लोग हर बात का अफ़साना बना लेते हैं
सबको हालात की रूदाद सुनाया न करो

ये ज़ुरूरी नहीं हर शख़्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख़्म अमानत हैं दिखाया न करो

शहर-ए-एहसास में पथराव बहुत हैं 'मोहसिन'
दिल को शीशे के झरोखों में सजाया न करो

13.
बहार रुत मे उजड़े रस्ते, तका करोगे तो रो पड़ोगे
 बहार रुत मे उजड़े रस्ते,
तका करोगे तो रो पड़ोगे
किसी से मिलने को जब भी मोहसिन,
सजा करोगे तो रो पड़ोगे

तुम्हारे वादों ने यार मुझको,
तबाह किया है कुछ इस तरह से
कि जिंदगी में जो फिर किसी से,
दगा करोगे तो रो पड़ोगे…

मैं जानता हूँ मेरी मुहब्बत,
उजाड़ देगी तुम्हें भी ऐसे …
कि चाँद रातों मे अब किसी से,
मिला करोगे तो रो पड़ोगे…

बरसती बारिश में याद रखना,
तुम्हें सतायेंगी मेरी आँखें …
किसी वली के मज़ार पर जब
दुआ करोगे तो रो पड़ोगे…!!!

14.
दिल यूँ धड़का के परेशान हुआ हो जैसे
  दिल यूँ धड़का के परेशान हुआ हो जैसे
कोई बे-ध्यानी में नुकसान हुआ हो जैसे

रुख बदलता हूँ तो शह रग में चुभन होती है,
इश्क भी जंग का मैदान हुआ हो जैसे,

जिस्म यूँ लम्स-ए-रफाकात के असर से निकला,
दुसरे दौर का सामान हुआ हो जैसे

दिल ने यूँ फिर मेरे सीने में फकीरी रख दी,
टूट कर खुद ही पशेमान हुआ हो जैसे,

थाम कर हाथ मेरा ऐसा वोह रोया मोहसिन,
कोई काफिर से मुसलमान हुआ हो जैसे ...!

15.
एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है
 एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है
मुझ को मेरे ही ख्यालों में सदा देता है

वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन
जब भी मिलता है तो पहलू में जगा देता है

मैं जो अन्दर से कभी टूट के बिखरूं
वो मुझ को थामने के लिए हाथ बढ़ा देता है

मैं जो तनहा कभी चुपके से भी रोना चाहूँ
तो दिल के दरवाज़े की ज़ंजीर हिला देता है

उस की कुर्बत में है क्या बात न जाने “मोहसिन”
एक लम्हे के लिए सदियों को भुला देता है 

16.
 क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच
 क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच
अब तो खुलने लगे मकतल भरे बाज़ार के बीच

अपनी पोषक के छीन जाने पे अफ़सोस न कर
सर सलामत नहीं रहते यहाँ दस्तर के बीच

सुर्खिया अमन की तलकीन में मसरूफ रहें
हर्फ़ बारूद उगलते रहे अख़बार के बीच


काश इस खवाब की ताबीर की मोहलत न मिले
शोले उगते नज़र आये मुझे गुलज़ार के बीच

ढलते सूरज की तमाज़त ने बिखर कर देखा
सर कशीदा मेरा साया साफ-ए-अश्जार के बीच

रिज्क़, मल्बोस, मकान, साँस, मर्ज़, कर्ज़, दवा
मुन्किसम हो गया इन्सान इन्हें अफकार के बीच

देखे जाते न थे आंसू मेरे जिस से मोहसिन
आज हँसते हुए देखा उसे अगयार के बीच

17.
 काश आ जाये वो मुझे जान से गुज़रते देखे
 काश आ जाये वो मुझे जान से गुज़रते देखे
खवाहिश थी कभी मुझ को बिखरते देखे

वो सलीके से हुआ हम से गुरेज़ाँ वरना
लोग तो साफ़ मोहब्बत से मुकरते देखे

वक़त होता है हर एक ज़ख़्म का मरहम मोहसिन
फिर भी कुछ ज़ख़्म थे ऐसे जो न भरते देखे

18.
ख्वाब आँखों में चुभो कर देखूं
 ख्वाब आँखों में चुभो कर देखूं
काश मैं भी कभी सो कर देखूं

शायद उभरे तेरी तस्वीर कहीं
मैं तेरी याद में रो कर देखूं

इसी ख्वाहिश में मिटा जाता हूँ
तेरे पांव, तेरी ठोकर देखूं

अश्क हैं, वहम की शबनम, के लहू ??
अपनी पलकें तो भिगो कर देखूं

केसा लगता है बिछड़ कर मिलना ?
मैं अचानक तुझे खो कर देखूं

अब कहाँ अपने गिरेबान की बहार ?
तार में ज़ख्म पिरो कर देखूं

मेरे होने से न होना बेहतर
तू जो चाहे, तेरा हो कर देखूं ?

रूह की गर्द से पहले मोहसिन
दाग़-ए-दमन को तो धो कर देखूं ..!!

19.
जब तेरी धुन में जिया करते थे
 जब तेरी धुन में जिया करते थे
हम भी चुप चाप फिरा करते थे

आँख में प्यास हुवा करती थी
दिल में तूफ़ान उठा करते थे

लोग आते थे ग़ज़ल सुनने को
हम तेरी बात किया करते थे

सच समझते थे तेरे वादों को
रात दिन घर में रहा करते थे

किसी वीराने में तुझसे मिलकर
दिल में क्या फूल खिला करते थे

घर की दीवार सजाने के लिए
हम तेरा नाम लिखा करते थे

वोह भी क्या दिन थे भुला कर तुझको
हम तुझे याद किया करते थे

जब तेरे दर्द में दिल दुखता था
हम तेरे हक में दुआ करते थे

बुझने लगता जो चेहरा तेरा
दाग सीने में जला करते थे

अपने जज्बों की कमंदों से तुझे
हम भी तस्खीर किया करते थे

अपने आंसू भी सितारों की तरह
तेरे होंटों पे सजा करते थे

छेड़ता था गम-ए-दुनिया जब भी
हम तेरे गम से गिला करते थे

कल तुझे देख के याद आया है
हम सुख्नूर भी हुआ करते थे

20.
वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है
 वफ़ा में अब यह हुनर इख्तियार करना है
वोह सच कहे न कहे ऐतबार करना है

यह तुझ को जागते रहने का शौक कब से हुआ?
मुझे तो खैर तेरा इंतजार करना है

हवा की ज़द में जलाने हैं आंसूं के चिराग
कभी ये जशन सर ए-राह-गुज़र करना है

वोह मुस्कुरा के नए वास-वासों में ढल गया
ख़याल था के उसे शरमसार करना है

मिसाल-ए-शाख-ए बढ़ाना खिजान की रुत में कभी
खुद अपने जिस्म को बे बर्ग ओ बार करना है

तेरे फ़िराक में दिन किस तरह कटें अपने
कि शुगल-ए-शब् तो सितारे शुमार करना है

चलो ये अश्क ही मोती समझ के बेच आये
किसी तरह तो हमें रोज़गार करना है

कभी तो दिल में छुपे ज़ख़्म भी नुमायाँ हों
काबा समझ के बदन तार तार करना है

खुदा जाने ये कोई जिद, के शौक है मोहसिन
खुद अपनी जान के दुश्मन से प्यार करना है

21.
तुझे है मशक-ए-सितम का मलाल वैसे ही
तुझे है मशक-ए-सितम का मलाल वैसे ही
हमारी जान थी, जान पर वबाल वैसे ही

चला था ज़िकर ज़माने की बे वफाई का
सो आ गया है तुम्हारा ख्याल वैसे ही

हम आ गए हैं तह-ए-दाम तो नसीब अपना
वरना उस ने तो फेंका था जाल वैसे ही

मैं रोकना ही नहीं चाहता था वार उस का
गिरी नहीं मेरे हाथों से ढाल वैसे ही

मुझे भी शौक़ न था दास्ताँ सुनाने का
मोहसिन उस ने भी पूछा था हाल वैसे ही 

22.
दिया खुद से बुझा देना

दिया खुद से बुझा देना
हवा को और क्या देना ?

सितारे नोचने वालो
फलक को आसरा देना

कभी इस तौर से हँसना
के दुनिया को रुला देना

कभी इस रंग से रोना
के खुद पर मुस्करा देना

मैं तेरी दस्तरस चाहूँ
मुझे ऐसी दुआ देना

मैं तेरा बरमला मुजरिम
मुझे खुल कर सजा देना

मैं तेरा मुनफ़रिद साथी
मुझे हट कर सजा देना

मेरा सर सब से ऊँचा है
मुझे मकतल नया देना

मुझे अच्छा लगा "मोहसिन "
उसे पा कर गँवा देना
23.
कुछ तो ऐ यार इलाज-ए-गम-ए-तन्हाई हो 
कुछ तो ऐ यार इलाज-ए-गम-ए-तन्हाई हो
बात इतनी भी न बढ़ जाये कि रुसवाई हो

जिस ने भी मुझको तमाशा सा बना रखा है
अब ज़रूरी है वोही आँख तमाशाई हो

डूबने वाले तो आँखों से भी खूब निकले हैं
डूबने के लिए लाजिम नहीं, गहराई हो

मैं तुझे जीत भी तोहफे में नहीं दे सकता
चाहता ये भी नहीं हूँ तेरी पासपाई हो

कोई अन्जान न हो शहर-ए-मोहब्बत का मकीं
काश हर दिल की हर इक दिल शहनसई हो

यूँ गुज़र जाता है मोहसिन तेरे कुचे से वोह
तेरा वाकिफ न हो जैसे कोई सौदाई हो ..!

24.
रेशम ज़ुल्फों, नीलम आँखों वाले अच्छे लगते हैं
 रेशम ज़ुल्फों, नीलम आँखों वाले अच्छे लगते हैं 
 मैं शायर हूँ मुझ को उजले चेहरे अच्छे लगते हैं

तुम खुद सोचो आधी रात को ठंडे चाँद की छांवों में
तन्हा राहों में हम दोनों कितने अच्छे लगते हैं

आखिर आखिर सच्चे कौल भी चुभते हैं दिल वालों को
पहले पहले प्यार के झूठे वादे अच्छे लगते हैं

काली रात में जगमग करते तारे कौन बुझाता है
किस दुल्हन को ये मोती ये गहने अच्छे लगते हैं

जब से वो परदेस गया है शहर की रौनक रूठ गई
अब तो अपने घर के बंद दरीचे अच्छे लगते हैं

कल उस रूठे रूठे यार को, देखा तो महसूस हुआ
मोहसिन उजले जिस्म पे मैले कपड़े अच्छे लगते हैं

25.
कभी याद आओ तो इस तरह 
कभी याद आओ तो इस तरह
कि लहू की सारी तमाज़तें
तुम्हे धूप धूप समेट लें 
तुम्हे रंग रंग निखार दें
तुम्हे हर्फ़ हर्फ में सोच लें
तुम्हे देखने का जो शौक हो
तू दयार-ए-हिज्र की तीरगी
कोह मिचगां से नोच लें !!
कभी याद आओ तो इस तरह
कि दिल-ओ-नज़र में उतर सको
कभी हद से हब्स-ए-जुनू बढ़े
तो हवास बन के बिखर सको
कभी खुल सको शब-ए-वस्ल में
कभी खून-ए-दिल में सँवर सको
सर-ए-रहगुज़र जो मिलो कभी
न ठहर सको न गुज़र सको !
मेरा दर्द फिर से ग़ज़ल बुने
कभी गुनगुनाओ तो इस तरह
मेरे जख्म फिर से गुलाब हों
कभी मुस्कुराओ तो इस तरह
मेरी धड़कनें भी लरज़ उठें
कभी चोट खाओ तो इस तरह
जो नहीं तू फिर बड़े शौक से
सभी राब्ते सभी जाब्ते
कभी धूप छांव में तोड़ दो
न शिकस्त-ए-दिल का सितम सहो
न सुनो किसी का अज़ाब-ए-जाँ
न किसी से अपनी ख़लिश कहो
यूंही खुश फिरो यूंही खुश रहो
न ऊजड़ सकें न सँवर सकें
कभी दिल दुखाओ तो इस तरह
न सिमट सकें न बिखर सकें
कभी भूल जाओ तो इस तरह
किसी तौर जाँ से गुज़र सकें
कभी याद आओ तो इस तरह

26.
एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है
 एक चेहरा जो मेरे ख्वाब सजा देता है
मुझ को मेरे ही ख्यालों में सदा देता है

वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन
जब भी मिलता है तो पहलू में जगा देता है

मैं जो अन्दर से कभी टूट के बिखरूं
वो मुझ को थामने के लिए हाथ बढ़ा देता है

मैं जो तनहा कभी चुपके से भी रोना चाहूँ
तो दिल के दरवाज़े की ज़ंजीर हिला देता है

उस की कुर्बत में है क्या बात न जाने “मोहसिन”
एक लम्हे के लिए सदियों को भुला देता है
 

27.
सुनो ऐसा नहीं करते
  सुनो ऐसा नहीं करते
सफ़र तन्हा नहीं करते

जिसे शफफ़ रखना हो
उसे मैला नहीं करते

बोहत उजड़े हुए घर पे
बोहत सोचा नहीं करते

सफ़र जिस के मुक़द्दर हो
उसे रोका नहीं करते

जो मिल कर खुद से खो जाये
उसे रुसवा नहीं करते

यह ऊँचाइओं पे कैसे हैं
कही साया नहीं करते

चलो तुम राज़ हो अपना
तुम्हें अफशां नहीं करते

तेरी आँखों को पढ़ते हैं
तुझे देखा नहीं करते

सहर से पूछ लो “मोहसिन”
के हम सोया नहीं करते

28.
रुखसत हुआ तो बात मेरी मान कर गया
 रुखसत हुआ तो बात मेरी मान कर गया
जो उस के पास था, मुझे दान कर गया

बिछड़ा कुछ इस अदा से के रुत ही बदल गयी
इक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया

दिल-चस्प वाकिया था के कल इक अज़ीज़ दोस्त
अपने मुफाद पर मुझे कुर्बान कर गया

कितनी सुधर गयी है जुदाई में ज़िन्दगी
हाँ वो वफ़ा से मुझ पर एहसान कर गया

“मोहसिन” मैं बात बात पर कहता था जिस को जान
वो शख्स आखिर मुझ को बे-जान कर गया 

29.
उजड़े हुए लोगों से गुरे-जान न हुआ कर
 उजड़े हुए लोगों से गुरे-जान न हुआ कर
हालत की कबरों के यह कत्बे भी पढ़ा कर

हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न करदे
तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर

इस शब् के मुक़द्दर में सहर ही नहीं “मोहसिन”
हम ने देखा है कई बार चरागों को बुझा कर  

30.
तमाम शब् जहाँ जलता है इक उदास दिया
 तमाम शब् जहाँ जलता है इक उदास दिया
हवा की राहों में इक ऐसा घर भी आता है

वोह मुझे टूट के चाहेगा, छोड़ जायेगा
मुझे खबर थी उसे ये हुनर भी आता है

वफ़ा की कौनसी मंजिल पे छोड़ा है उस ने
के वोह याद हमें भूल कर भी आता है

इसीलिए मैं किसी शब् न सो सका “मोहसिन”
वोह माहताब कभी बाम पर भी तो आता है
 

31.
ज़िन्दगी क्या है कभी दिल मुझे समझाए तो
 ज़िन्दगी क्या है कभी दिल मुझे समझाए तो
मौत अच्छी है अगर वक़्त पे आ जाये तो

मुझ को जिद है के जो मिलना है फलक से उतरे
उस की खवाहिश है दामन कोई फैलाये तो

कितनी सदियों की रफ़ाक़त, मैं उसे पहना दूँ
शर्त यह है वोह मुसाफिर कभी लौट आये तो

धूप “मोहसिन ” है ग़नीमत मुझे अब भी लेकिन
मेरी तन्हाई को साया मेरा बहलाए तो _____ !
 

32. 
अब के सादा कागज़ पर
 अब के सादा कागज़ पर
सुर्ख रोशनाई से
उस ने तल्ख़ लहजे में
मेरे नाम से पहले
सिर्फ 'बेवफा' लिखा !!
33.
 
वो मायूसी के लम्हों में
 वो मायूसी के लम्हों में,
ज़रा भी हौसला देता ... मोहसिन !

तो हम कागज़ की कश्ती पे,
समंदर में उतर जाते...!
34.
 
फासले बढ़ गए हैं
 फासले बढ़ गए हैं ..............
और कमबख्त मोहब्बत भी......
35.
 
यह जो हम हैं न
 यह जो हम हैं न  !!!!
एहसास में जलते हुए लोग

हम ज़मीनजाद न होते
तो सितारे होते 
36.
 
तो अपने आप से नज़रें चुरा लेना 
तुम जब भी आईना देखो
तो अपने आप से नज़रें चुरा लेना

के अक्सर बेवफा लोगों को
जब वो आईना देखें

तो आंखें चोर लगती हैं ....!!!!
37.

 तमाम उमर वोही किस्सा-ए-सफ़र कहना
 तमाम उमर वोही किस्सा-ए-सफ़र कहना
के आ सका न हमें अपने घर को घर कहना

जो दिन चढ़े  तो तेरे वस्ल की दुआ करना
जो रात हो तो दुआ को ही बे-असर कहना

वो शख्स मुझसे बोहत बदगुमान सा रहता है
ये बात उस से कहो भी तो सोच कर कहना

कभी वो चाँद जो पूछे के शहर कैसा है ?
बुझे बुझे हुए लगते हैं बाम-ओ-दर कहना

हमारे बाद अजीजो, हमारा अफसाना !!!
कभी जो याद भी आए तो मुख्तासिर कहना

वो एक मैं की मेरा शहर भर को अपने सिवा
तेरी वफ़ा के तकाज़ों से बे-खबर कहना

वो एक तू की तेरा हर किसी को मेरे बग़ैर
मुआमलात-ए-मोहब्बत में मोतबर कहना

वफ़ा की तर्ज़ है मोहसिन के मसलिहत क्या है
ये तेरा दुश्मन-ए-जान को भी चारा-गर कहना
38.
 
उसका पैगाम हवा में आये
 सोज़ इतना तो नवा में आये ...
उसका पैगाम हवा में आये

यूँ अचानक तुझे पाया मैं ने
जैसे तासीर दुआ में आये

रोग क्या जी को लगा है मोहसिन
ज़हर का नाम दवा में आए ..
 

39.
 जो सुनायी दे उसे चुप सिखा
 न सन्नाटों में तपिश घुले,
न नज़र को वक्फ-ए-अजाब कर
जो सुनायी दे उसे चुप सिखा,
जो दिखायी दे उसे ख्वाब कर

अभी मुंतशिर न हो अजनबी,
न विसाल रुत के करम जता
जो तेरी तलाश में गम हुवे,
कभी उन दिनों का हिसाब कर

मेरे सब्र पर कोई अज्र क्या,
मेरी दोपहर पे ये अब्र क्यूँ ?
मुझे ओढने दे अज़ीयतें,
मेरी आदतें न ख़राब कर

कहीं आबलों के भंवर बजे,
कहीं धुप रूप बदन सजे
कभी दिल को थाल का मिज़ाज दे
कभी चाम-ए-तर को चनाब कर

ये हुजूम-ए शहर-ए-सितमगरां ,
न सुनेगा तेरी सदा कभी
मेरी हसरतों को सुखन सुना,
मेरी खवाहिशों से ख़िताब कर ...

40.
तू मेरा नाम न पूछा कर
 

मैं तेरी सोच में शामिल हूँ
मैं तेरी नींद का किस्सा हूँ
मैं तेरे खवाब का हासिल हूँ

मैं तेरी याद का माहवार हूँ
मैं तेरी साँस का झोंका हूँ
तू मंज़र, मैं पस मंज़र हूँ
मैं लम्हा हूँ मैं जज्बा हूँ

जज्बे का कोई नाम नहीं
तू मेरा नाम न पूछा कर

41.
तुम्हें जब रु-बरु देखा करेंगे
तुम्हें जब रु-बरु देखा करेंगे
ये सोचा है बहुत सोचा करेंगे

नज़र में चौहदवी का चाँद होगा
समुन्दर की जुबान बोला करेंगे

तुम्हारा अक्स जब उतरेगा दिल में
बदन में आईने टूटा करेंगे

बिछड़ना है तो ये तय कर लें अभी से
जुदाई का सफ़र तनहा करेंगे

न आयेगा कोई इलज़ाम तुम पर
हम अपने आप को रुसवा करेंगे

एक उलझन में कटी है उमर मोहसिन
के पल दो पल में हम क्या क्या करेंगे !
42.
 
मेरे आँगन में कभी फूल खिला करते थे
 मेरे आँगन में कभी फूल खिला करते थे
मेरी आँखों में भी कुछ खवाब बसा करते थे

मुझ को हालात की आंधी ने गिराया वरना
मेरे सीने में भी कुछ लोग रहा करते थे

है मुझे याद रफाकात की वो गहराइयाँ अभी भी
दिल की धड़कन भी तेरी साफ़ सुना करते थे

आज महफ़िल में वो अंजान बने बैठे हैं
जो कभी मुझे अपनी जान कहा करते थे

अब तरसती हैं तेरी दीद को आँखें मोहसिन
एक ज़माना था के हम रोज़ मिला करते थे
43.

मेरे सनम मुस्कुरा न देना
 उदास तहरीर पढ़ के मेरी, मेरे सनम मुस्कुरा न देना
ये आखरी ख़त मैं लिख रहा  हूँ, ख्याल करना जला न देना

गुज़र रही है तुम्हारी कैसे, बिछड़ के हम से रुला के हमको
हकीकतों को ज़रूर  लिखना, अना की खातिर छुपा न देना

कोई पूछे किधर गया वो, जो तेरी महफ़िल का था सहारा
जो फुर्क़तों का सबब बने थे, किसी बशर को बता न देना

मैं मर भी जाऊ तो मुस्कुराना, एहसास-ए-गम की न चोट खाना
जो कुर्ब-ए-ग़म से निगाहें भीगें तो रुख से आँचल हटा न देना

लहू से तहरीर कर रहा हूँ, मैं अपनी सारी कहानी मोहसिन
जो फाड़ भी दो तो पास रखना, हवा में टुकड़े उड़ा न देना

44.
कभी याद आओ तो इस तरह
कभी याद आओ तो इस तरह
कि लहू की सारी तमाज़तें
तुम्हे धूप धूप समेट लें 
तुम्हे रंग रंग निखार दें
तुम्हे हर्फ़ हर्फ में सोच लें
तुम्हे देखने का जो शौक हो
तू दयार-ए-हिज्र की तीरगी
कोह मिचगां से नोच लें
कभी याद आओ तो इस तरह
कि दिल-ओ-नज़र में उतर सको
कभी हद से हब्स-ए-जुनू बढ़े
तो हवस बन के बिखर सको
कभी खुल सको शब-ए-वस्ल में
कभी खून-ए-दिल में सँवर सको
सर-ए-रहगुज़र जो मिलो कभी
न ठहर सको न गुज़र सको
मेरा दर्द फिर से ग़ज़ल बुने
कभी गुनगुनाओ तो इस तरह
मेरे जख्म फिर से गुलाब हों
कभी मुस्कुराओ तो इस तरह
मेरी धड़कनें भी लरज़ उठें
कभी चोट खाओ तो इस तरह
जो नहीं तू फिर बड़े शौक से
सभी राब्ते सभी जाब्ते
कभी धूप छांव में तोड़ दो
न शिकस्त-ए-दिल का सितम सहो
न सुनो किसी का अज़ाब-ए-जाँ
न किसी से अपनी ख़लिश कहो
यूंही खुश फिरो यूंही खुश रहो
न ऊजड़ सकें न सँवर सकें
कभी दिल दुखाओ तो इस तरह
न सिमट सकें न बिखर सकें
कभी भूल जाओ तो इस तरह
किसी तौर जाँ से गुज़र सकें
कभी याद आओ तो इस तरह

45.
दुआ नहीं तो गिला देता कोई
 दुआ नहीं तो गिला देता कोई
मेरी वफाओं का सिला देता कोई

जब मुकद्दर ही नहीं था अपना
देता भी तो भला क्या देता कोई

हासिल-ए-इश्क फकत दर्द है
ये काश पहले बता देता कोई

तकदीर नहीं थी अगर आसमान छूना
ख़ाक में ही मिला देता कोई

बेवफा ही हमें बेवफा कह गया
इस से ज्यादा क्या दगा देता कोई

गुमान ही हो जाता किसी अपने का
दामन ही पाकर हिला देता कोई

अरसे से अटका है हिचकियों पे दिन
अच्छा होता के भूला देता कोई

46.
दिल भी धड़के
बादल बरसें !
बादल इतनी ज़ोर से बरसें
मेरे शहर की बंजर धरती
गुमसुम खाक उड़ाते रस्ते
सुखाएचेहरे पीली अंखियन
बोसीदा मटियाले पैकर ऐसी बहकें
अपने को पहचान न पाएँ

बिजली चमके !
बिजली इतनी ज़ोर की चमके
मेरे शहर की सूनी गलियाँ
मुद्दत्त के तारीक झरोखे
पुर'इसरार खंडहर वीराने
माज़ी की मद्धम तस्वीरें ऐसी  चमकें
सीने का हर भेद ऊगल दें

दिल भी धड़के !
दिल भी इतनी ज़ोर से धड़के
सोचों की मजबूत तनाबे
ख्वाहिश की अनदेखी गिरहें
रिश्तों की बोझल ज़ंजीरें, एक छंके से खुल जाएँ
सारे रिश्ते
सारे बंधन
चाहूँ भी तो याद ना आएँ
आखें, अपनी दीद को तरसें
बादल इतने ज़ोर से बरसें 

47.
ज़रा सी देर में हम कैसे खोलते उसको
 ज़रा सी देर में हम कैसे खोलते उसको
तमाम उमर लगी झूठ बोलते उसको

जिसे काशीद किया था खुमार-ए-खुश्बू से
मिसाल-ए-रंग हवाओं में घोलते उसको

वो ख्वाब में ही उतरता शुआ-ए-सुबह के साथ
हम अपने आप ही पलकों पे तौलते उसको

वो अश्क था उसे आँखों में दफ़न होना था
गोहर न था के सितारों में तोलते उसको

वो बे-वफ़ा था तो इकरार लाज़मी करता
कुछ और देर मेरी जान टटोलते उसको

किसी की आँख से “मोहसिन” ज़रूर पीता है
तमाम शहर ने देखा है डोलते उसको 

48.
मेरी तरह किसी से मुहब्बत उसे भी थी
ज़िक्र-ए-शब-ए-फिराक से वहशत उसे भी थी
मेरी तरह किसी से मुहब्बत उसे भी थी

मुझको भी शौक था नए चेहरों कि दीद का
रास्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी

उस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ्तगू
मसरूफ़ मैं भी कम था फरागत उसे भी थी

सुनता था वो भी सबसे पुरानी कहानियाँ
ताज़ा रफाकतों की ज़रूरत उसे भी थी

मुझ से बिछड़ के शहर में घुल मिल गया वो शख्स
हालांकि शहर भर से अदावत उसे भी थी

वो मुझ से बढ़ के ज़ब्त का आदी था जी गया
वरना हर एक सांस क़यामत उसे भी थी 

49.
 काश बनाने वाले ने मुझे किताब बनाया होता
  काश बनाने वाले ने मुझे किताब बनाया होता
वोह पढ़ते पढ़ते सो जाती मुझे सीने से लगाया होता

मैं उसके गम में रोता और रोता ही जाता
उस ने चुपके से मुझे सीने से लगाया होता

उस को दास्तान सुना सुना के थक सा गया
काश उस ने भी मुझे हाल-ए-दिल सुनाया होता

मैं उस का नाम लेता और सुबहो शाम लेता था
है अफ़सोस उस ने मुझे एक बार बुलाया होता

मैं उस की खातिर तड़पता रहा शाम ओ सहर 'मोहसिन'
अरमान न होता गर उसने एक आंसू ही बहाया होता 

50.
  नज़र में ज़ख़्म-ए-तबस्सुम छुपा छुपा के मिला
 नज़र में ज़ख़्म-ए-तबस्सुम छुपा छुपा के मिला
खफा तो था वो मगर मुझ से मुस्कुरा के मिला

वो हमसफ़र के मेरे तंज़ पे हंसा था बोहत
सितम ज़रीफ़ मुझे आइना दिखा के मिला

मेरे मिज़ाज पे हैरान है ज़िन्दगी का शऊर
मैं अपनी मौत को अक्सर गले लगा के मिला

मैं उस से मांगता क्या? खून बहा जवानी का
के वो भी आज मुझे अपना घर लुटा के मिला

मैं जिस को ढूँढ रहा था नज़र के रास्ते में
मुझे मिला भी तो ज़ालिम नज़र झुका के मिला

मैं ज़ख़्म ज़ख़्म बदन ले के चल दिया “मोहसिन”
वो जब भी अपनी काबा पर कँवल सजा के मिला

51.
जाने  अब  किस  देस  मिलेंगे  ऊँची  जातों  वाले  लोग ?
 जाने  अब  किस  देस  मिलेंगे  ऊँची  जातों  वाले  लोग ?
नेक निगाहों, सच्चे  जज्बों  की  सौगातों  वाले  लोग

प्यास  के  सहराओं  में  धूप  पहेन कर  पलते  बंजारों …!
पलकों  ओट तलाश  करो , बोझल  बरसातों  वाले  लोग

वक़्त  की  उड़ती  धूल  में  अपने  नक्श  गंवाए  फिरते  हैं,
रिम  झिम  सुबहों, रोशन  शामों, रेशम  रातों  वाले  लोग

एक  भिकारन   ढूँढ  रही  थी   रात  को  झूठे  चेहरों  में,
उजले  लफ़्ज़ों, सच्ची  बातों  की  खैरातों  वाले  लोग

आने  वाली  रोग  रुतों  का  पुरसा  दें  हर  लड़की  को …!
शेहनाई  का  दर्द  समझ  लें  गर  बारातों  वाले  लोग

पत्थर  कूटने  वालों  को  भी  शीशे  जैसी  सांस  मिले  !!
“मोहसिन ” रोज़  दुआएं  मांगें  ज़ख़्मी  हाथों  वाले  लोग 

52.
वोह दिल का बुरा, न बेवफा था
वोह दिल का बुरा, न बेवफा था
बस, मुझ से यूंही बिछड़ गया था

लफ़्ज़ों की हदों से मावरा था
अब किस से कहूँ वोह शख्स कहाँ था ?

वोह मेरी ग़ज़ल का आइना था
हर शख्स यह बात जानता था

हर सिमत उसी का तज़करा था
हर दिल में वोह जैसे बस रहा था

मैं उस की अना का आसरा था
वोह मुझ से कभी न रूठता था

मैं धुप के बन में जल रहा था
वोह साया-अब्र बन गया था

मैं बाँझ रुतों का आशना था
वोह मोसम-ए-गुल का ज़ाइका था

एक बार बिछड़ के जब मिला था
वोह मुझ से लिपट के रो पड़ा था

क्या कुछ न उस से कहा गया था?
उस ने तो लबों को सी लिया था

वोह चाँद का हमसफ़र था शायद
रातों को तमाम जगता था

होंटों में गुलों की नरम खुशबू
बातों में तो शहद घुलता था

कहने को जुदा था मुझ से लेकिन
वोह मेरी रगों में गूंजता था

उस ने जो कहा, किया वोह दिल ने
इंकार का किस में हौसला था

यूँ दिल में थी याद उसकी जैसे
मस्जिद में चराग जल रहा था

मत पूछ हिजाब के करीने
वोह मुझ से भी कम ही खुल सका था

उस दिन मेरा दिल भी था परेशां
वोह भी मेरे दिल से कुछ खफा था

मैं भी था डरा हुवा सा लेकिन
रंग उस का भी कुछ उड़ा उड़ा था

एक खोफ सा हिज्र की रुतों का
दोनों पे मोहित हो चला था

एक राह से मैं भी था गुरेज़ाँ
एक मोड़ पे वोह भी रुक गया था

एक पल में झपक गईं जो आँखें
मंज़र ही नज़र में दूसरा था

सोचा तो ठहर गए ज़माने
देखा तो वोह दूर जा चुका था

कदमों से ज़मीन सिरक गयी थी
सूरज का भी रंग सांवला था

चलते हुवे लोग रुक गए थे
ठहरा हुवा शहर घूमता था

सहमे हुवे पेड कांपते थे
पत्तों में हीरस रेंगता था

रखता था मैं जिसमें खवाब अपने
वोह कांच का घर चटख गया था

हम दोनों का दुःख था एक जैसा
एहसास मगर जुदा जुदा था

कल शब वोह मिला था दोस्तों को
कहते हैं उदास लग रहा था

मोहसिन यह ग़ज़ल ही कह रही है
शायद तेरा दिल दुःख हुवा था
53.
 
वो चाहने वालो को मुखातिब नही करता
 वो चाहने वालो को मुखातिब नही करता
और तर्क-ए-तालुक की मैं वजाहत नही करता

वो अपनी जफ़ाओं पे नादिम नही होता
मैं अपनी वफाओं की तिजारत नही करता

खुशबू किसी ताश-हीर की मुहताज नही होती
सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नही करता

एहसास की सूली पे लटक जाता हूँ अक्सर
मैं जब्र-ए-मुसल्सल की शिकायत नही करता

मैं अजमत-ए-इन्सान का कायल तो हूँ मोहसिन
लेकिन कभी बन्दों की इबादत नही करता



Jaane Ab Kis Dais Milain Ge Unchi Zaaton Waalay Loog?
Naik Nigahon, Sache Jazbon Ki Saugaaton Waalay Loog

Pyaas Ke Sehraaon Mein Dhoop Pehen Kar Paltay Banjaaro…!
Palkon Oat Talaash Karo, Bojhal Barsaaton Waalay Loog

Waqt Ki Urrti Dhool Mein Apne Naqsh Ganwae Phirte Hain,
Rim Jhim Subhon, Roshan Shaamon,Resham Raaton Waalay Loog

Aik Bhikaarun Dhoond Rahi Thi Raat Ko Jhoote Chehron Mein,
Ujle Lafzon, Sachi Baaton Ki Khairaaton Waalay Loog

Aane Waali Rog Ruton Ka Pursa Dain Har Larki Ko…!
Shehnaai Ka Dard Samajh Lein Gar Baaraton Waalay Loog

Pathar Kootne Waalon Ko Bhi Sheeshe Jaisi Saans Milay !
“Mohsin” Roz Duaaen Maangain Zakhmi Haathon Waalay Loog

52.
 
मुहं छुपाये हुए गुज़रा है
 मुहं छुपाये हुए गुज़रा है इधर से जो वोह आज,
उस की आँखों में कोई ज़ख़्म नया लगता है ….
53.
 
सारी वफायें भूल जाते हैं
 यूँ वफ़ा के सिलसिले मुसल्सल न रख किसी से ….! मोहसिन
लोग इक खता के बदले, सारी वफायें भूल जाते हैं .!!

 54.
बादल बरसें !
बादल इतनी ज़ोर से 
बरसें !!
मेरे शहर की बंजर धरती
गुम सुम खाक उड़ाते रस्ते
सुखाए चेहरे पीली अंखियन
बोसीदा मटियाले पैकर ऐसी बहकें
अपने को पहचान न पाएँ !
बिजली चमके !
बिजली इतनी ज़ोर की चमके!
मेरे शहर की सूनी गलियाँ
मुद्दत्त के तारीक झरोखे
पुर इसरार खंडहर वीराने
माज़ी की मद्धम तस्वीरें ऐसी चमकें
सीने का हर भेद ऊगल दें !

दिल भी धड़के !
दिल भी इतनी ज़ोर से धड़के !
सोचों की मजबूत तनाबे
ख्वाहिश की अनदेखी गिरहें
रिश्तों की बोझल ज़ंजीरें
एक छंके से खुल जाएँ
सराय रिश्ते
सारे बंधन
चाहूँ भी तो याद ना आएँ
आखें अपनी दीद को तरसें

बादल इतने ज़ोर से बरसें !

55.
निगाह-ए-यार पे पलकों की अगर लगाम न हो
 निगाह-ए-यार पे पलकों की अगर लगाम न हो
बदन में दूर तलक ज़िन्दगी का नाम न हो

वो बे-नकाब जो फिरती है गली कूंचों में
तो कैसे शहर के लोगों में क़त्ल-ए-आम न हो

मुझे यकीं है कि दुनिया में दर्द बढ़ जाएँ
अगर ये पीने पिलाने के एहतमाम न हो

बिठा के सामने बस देखता रहूँ उस को
इस के सिवा मुझे दुनिया का कोई काम न हो

जो उसको देख ले अफताब एक नज़र 'मोहसिन'
मेरे शहर की गलियों में कभी शाम न हो
56.

गुमसुम सी रहगुज़र थी, किनारा नदी का था
 गुमसुम सी रहगुज़र थी, किनारा नदी का था
पानी में चाँद, चाँद में चेहरा किसी का था

अब ज़िन्दगी संभल कि लेता है तेरा नाम
ये दिल कि जिसको शौक कभी खुदकुशी का था

कुछ अब्र भी थे बाँझ ज़मीं से डरे हुए
कुछ जायका हवा में मेरी तिशनगी का था

कहने को ढूंढते थे सभी अपने खद-ओ-खाल
वरना मेरी ग़ज़ल में तो सब कुछ उसी का था

वह एतिहात-ए-जान थी कि बे-रब्ती बे-ख्याल
साए पे भी गुमान मुझे आदमी का था

मुश्किल कहाँ थे तर्क-ए-मुहब्बत के मरहले
ए दिल मगर सवाल तेरी ज़िन्दगी का था

वह जिसकी दोस्ती ही मता-ए-ख़ुलूस थी
'मोहसिन' वो शख्स भी दुशमन कभी का था

57.
तेरी हथेली पे किसने लिखा है क़त्ल मेरा 

तेरी हथेली पे किसने लिखा है क़त्ल मेरा
मुझे तो लगता है मैं तेरा दोस्त भी रहा हूँ

भुला दे मुझको के बे-वफाई बजा है लेकिन
गँवा न मुझको के मैं तेरी ज़िन्दगी रहा हूँ
~मोहसिन नकवी

Mohsin Naqvi : Urdu Poetry in English
Mohsin Naqvi : Ghazal, Nazm, Shayari
1.
Qatal chhupte thay kabhi sang ki deewar ke beech
Ab to khulny lagy maqtal bhary bazar k beech

Apni poshak ke chhin jany pe afsoos na kar
Sar salamat nae rehty yahan dastar k bech

Surkhian aman ki talqeen mein masroof rahen
Haroof barod ugalty rahy akhbar k bech

Kash iss khuwab ki tabeer ki mohlat na mily
Sholy ugtay nazar aay mujhy gulzar k bech

dhalty soraj ki tamazat nay bikhar kar dekha
sar kasheeda mira saya saf-e-ashjar k bech

Rizq, malbos, makaN, sans, marz, qarz, dawa
Munqisem ho gya insaN inhe afkar k bech

Dekhy jaty na thy aanso mry jis say Mohsin
Aj hansty howy dekha usay aghyar k bech
 

2.
Aankhen khuli rahe gi toh manzar bhi ayenge
Zinda hai dil to aur sitamgarr bhi ayenge

Pahchaan lo tamaam faqeeron ke khadd-o-khaal
Kuchh log shab ko bhais badal kar bhi ayenge

Gahri khamosh jheel ke paani ko yun na chhed
Chheenthe ude toh teri qaba par bhi ayenge

Khud ko chhupa na sheesha garon ki dukaan me
Sheeshe chamak rahe hain to patthar bhi ayenge

Aye shahr yaar dasht se fursat nahi — magar!!
Nikle safar pe hum to tere ghar bhi ayenge

''Mohsin" abhi saba ki sakhawat pe khush na ho
Jhonke yahi basoorat-e-sarr sarr bhi ayenge
 

3.
Sabeel-e-Dard Tham Jaye, Kharosh-e-Dil Thehar Jaaye
Zara Sii Dair Ko Hangama-e-Mahfel Tehar Jaaye

Shab-e-Maqtal Ka Sanaata Gawahi Dey Na Dey Apni
Laho Ki Mouj May Aks-e-Rukh-e-Qaatil Tehar Jaaye

Tabiyat Toot Kar Chahye Talaatum Ashiana Hona
Mager Tashna Labi Ki Zid Ser–e–Saahil Tehar Jaaye

Muheet-e-Roz o Shab Say Aaj Tak Hum Per Nahi Utra
Woh Ek Lamha k Apni Umr Ka Haasil Tehar Jaaye

Kahin To Saans Lay, Thak Kar Hajoom-e-Abla Paa’yii
Kabhi To Halqa-e-Gard-e-Safer ,Manzil Tehar Jaaye

Koi Hurf-e-Malamat Hoo Kar Zanjeer-e-Dua Chhankaye
Kisi Awaz Per To Be Sada Saayel Tehar Jaaye

Kahaa K QAIS Tay Hum Bhi Mager Itna Ghanimat Hai
K Dasht-e-Khawab May Akser Tera Mahmal Tehar Jaaye

Bichar Kar Bhi Woh Chehra Aankh Say Hat’ta Nahi MOHSIN
K Jaisay Jheel Main Aks-e-Meh-e- Kaamil Tehar Jaaye 

4.
Diya khud se bujha dena.
Hawa ko or kya dena?

Sitare nochne walo
Falk ko aasra dena

Kbi is taor sy hansna
K dunya ko rula dena

Kbi is rang sy rona
K khud pr muskra dena

Men teri dastaras chahon
Mujhe esi dua dena

Men tera barmla mujrim
Mujhe khul kr saza dena

Men tera munfarid sathi
Mujhe hat kr jaza dena

Mera sr sb sy uncha hai
Mujhe maqtl naya dena

Mujhe achha laga "mohsin".,
Use pa kr ganwa dena.,,,,,,,,
 

5.
 Kuchh to Ae yaar elaj-e-ghum-e-tanhai ho
Baat itni bhi na bad jaye kii ruswai ho

Jis ne bhi mujhko tamasha sa bana rakha hai
Ab zaruri hai wohi aankh tamashai ho

Dubne wale to aankho se bhi khub nikle hain
Dubne ke liye lazim nahi, gahrai ho

Main tujhe jeet bhi tohfe me nahi de sakta
Chahta ye bhi nahi hun teri paspai ho

Koi anjan na ho shahr-e-mohabat ka makeen
KASH har dil ki har ik dil shahanasai ho

Yun guzar jata hai MOHSIN tere kuche se woh
Tera wakif na ho jese koi Saudayi ho..!

6.
 Ek Chehra Jo Mere Khwaab Sajaa Deta Hai
Mujh Ko Mere Hee Khayaalon Mein Sadaa Deta Hai

Wo Mera Kon Hai Maloom Nahi Hai Lekin
Jub Bhi Milta Hai To Pehluu Mein Jagaa Deta Hai

Mein Jo Andar Se Kabhi Toot Ke Bikhruun
Wo Mujh Ko Thaamne Ke Liye Haath Barda Deta Hai

Mein Jo Tanha Kabhi Chupke Se Bhi Rona Chaahun
To Dil Ke Darwaaze Ki Zanjeer Hila Deta Hai

us Ki Qurbat Mein Hai Kya Baat Na Jaane “Mohsin”
Ek Lamhe Ke Liye Sadiyon Ko Bhula Deta Hai

7.
 Ye soch lia ha k kisi ko Awaz nai Deni Mohsin!
K ab me b to Dekhun koi Kitna Talabgar ha mera.

8.
Main khud zameen hon magar zarf aasman ka hai
K toot kar bhi mera hosla chatan ka hai.
Bura na maan mere hurf zehar, zehar say hain
Main kya karon keh yehi zaiqa zuban ka hai.

9.
Na Snnaaton mein Tapish ghule,
Na nazar ko waqf-e-Azab kar
Jo sunayii de use chupp sikha,
Jo dikhayii de usay khuab kar

Abhi Muntashir na ho Ajnabi,
Na Wisal rut ke karam jita
Jo Teri talash mein gum huwe,
Kabhi un dinon ka hisab kar

Mere Sabr per koi Ajrr kya,
Meri dopahar pe ye Abrr kiun?
Mujhe odhne de Azziyaten,
Meri Aadten na kharab kar

Kahin aablon ke bhanwar baje,
Kahin dhoop roop badan saje
Kabhi Dil ko thal ka mizaaj de
Kabhi Cham-e-Tar ko chanab kar

Ye hujum-e-Sheher- e-Sitamgaran,
Na sune ga Teri Sadaa kabhi
Meri Hasraton ko Sukhan suna,
Meri khawahishon se khitab kar

10. 
Tujhe hai Mashq-e-Sitam ka Malal waise hi
Humhari Jaan thi, Jaan per Wabaal waise hi

Chala tha Zikar Zamane ki Be wafai ka
So Aa gaya hai Tumhara Khayal waise hi 


Hum Aa gaye hain Teh-e-Daam to Naseeb apna
Warna Us ne to Phenka tha Jaal waise hi

Mein Rokna he nahi Chahta tha Waar Us ka
Giri nahi meray Haathon se Dhaal waises hi

Mujhay Bhi Shoq na tha Daastaan Sunane ka
MOHSIN Us ne Bhi Poochha tha Haal waise hi

11.
 Dil yun dharka ke pareshaan hua ho jaisay
Koi be-dhiaani mein nuqsaan hua ho jaisay

Rukh badalta hun to shah rag mein chubhan hoti hy
Ishq bhi jang ka maidaan hua ho jaisay

Jism yun lams-e-rafaaqat ke asar se nikla
Doosre daor ka saamaan hua ho jaisay

Dil ne yun phir mere seene mein faqeeri rakh di
Toot kar khud hi pashemaan hua ho jaisay

Thaam kar haath mera aisa woh roaya Mohsin
Koi kaafir se musalmaan hua ho jaisay
  

12.
 Ab k sada kagaz par
surkh roshnai sey
Us ne talkh lehje mein
mery naam se pehle
sirf 'Bewafa' likha !
13.
Wo ek pal ko dikhai to dy kaheen Mohsin!!
Mein Jaan ganwa k bhi Uss pal ko mukhtasir na karoon !

14.
 Nazar Mein Zakham-e-Tabassum Chhupa Chhupa Ke Mila
Khafa Tou Tha Wo Magar Mujh Se Muskura Ke Mila

Wo Hamsafar Ke Mere Tanz Pe Hansa Tha Bohat
Sitam Zareef Mujhe Aaina Dikha Ke Mila

Mere Mizaaj Pe Hairaa.n Hai Zindagi Ka Shaoor
Mein Apni Mout Ko Aksar Galay Laga Ke Mila

Mein Os Se Maangta Kia Khoon Bahaa Jawaani Ka
Ke Wo Bhi Aaj Mujhe Apna Ghar Luta Ke Mila

Mein Jis Ko Dhoond Raha Tha Nazar Ke Rastay Mein
Mujhe Mila Bhi Tou Zaalim Nazar Jhuka Ke Mila

Mein Zakham Zakham Badan Le Ke Chal Dya “Mohsin”
Wo Jub Bhi Apni Qabaa Per Kanwal Sajaa Ke Mila

15.
 jese Jese Waqat Guzarta Jata Hai
Zakham Tumhare Hijar Ka Bharta Jata Hai

Kankar Pehnkne Walon Ko Kuch Ilm Nhi
Pani Main Ik Aks Bikharta Jata Hai

Dil Ki Gurbat Saray Ghar Main Phel Gai
Tasveeron Se Rang Utarta Jata Hai

Bujhti Ankh K Sa’aye Phalty Jaty Hain
Sham Ka Manzar Or Nikharta Jata Hai”Mohsin”

Is Ne Dil Ka Shaher Ujar Diya
Main Smjhta Tha Bakht Sawanarta Jata Hai……!!

16.
Shamil Mera Dushman Saf-e-Yaraan Mein Rahega
Yeh Teer Bhi Paywast-e-Rag-e-Jaan Mein Rahega,

Ek Rasm-e-Januu Apne Muqaddar Mein Rahegi
Ek Chaak Sadaa Apne Girebaan Mein Rahega,

Ek Ashk Hai Aankhon Mein So Chamkega Kahaan Tak?
Yeh Chaand Zad-e-Shaam-e-Ghareebaan Mein Rahega,

Main TUjh Se Bechar kar Bhi Kahaan Tujh Se Juda Hoon
Tu Khawaab Sifat Deeda-e-Giryaan Mein Rahega,

Rangon Ki Koi Rut Teri Khushbu Nahi Laaie
Yeh Daagh Bhi Damaan-e-Baharaan Mein Rahega,

Ab Kay Bhi Guzar Jaaenge Sab Wasl Kay Lamhe
Masroof Koi Wada-o-Paymaan Mein Rahega,

Main Harf-e-Januu Keh Na Sakoonga, Jo Kahoon Bhi
Ek Raaz Ki Soorart Dil Imkaan Mein Rahega,

“Mohsin” Main Hawadis Ki Hawaaon Mein Ghera Hoon
Kiya Naqsh-e-Qadam Dasht-o-Bayabaan Mein Rahega ?

17.
Aahat Si Howi Thi, Naa Koi Barg Hilaa Tha
Main Khud Hi Sar-e-Manzil-e-Shab Cheekh Para Tha,

Lamhon Ki Faseelein Bhi Mere Gird Khari Thien
Main Phir Bhi Tujhe Shaher Mein Awaara Laga Tha,

Tune Jo Pukaara Hai Tou Bol Uthaa Hoon, Warna
Main Fikar Ki Dehleez Pe Chup Chaap Khara Tha,

Phaili Thi Bhare Shaher Mein Tanhai Ki Baaten
Shayad Koi Deewar Kay Peeche Bhi Khara Tha,

Ab Is Kay Siwaa Yaad Nahi Jashn-e-Mulaqaat
Ek Maatmi Jugnu Meri Palkon Pe Sajaa Tha,

Ya Barish-e-Sang Ab Kay Musalsal Na Howi Thi
Ya Phir Main Tere Shaher Ki Raah Bhool Gaya Tha,

Ek Jalwa-e-Mehboob Se Roshan Tha Mera Zehn
Wajdaan Yeh Kehta Hai Wohi Mera Khuda Tha,

Weraan Na Ho Is Darja Koi Mosam-e-Gul Bhi
Kehte Hain Kisi Shakh Pe Ek Phool Khila Tha,

Ek Tu Kay Gurezaan Hi Raha Mujh Se Beher Tor
Ek Main Kay Tere Naqsh-e-Qadam Choom Raha Tha,

Dekha Na Kisi Ne Bhi Meri Simt Palat Kar
“Mohsin” Main Bikharte Howe Sheeshon Ki Sadaa Tha

*********
For more translation and poetry: pls visit my website 
http://wanderingunlost.com/

 

1 comment: